I am inexplicble !

Her glance fly butterflies inside me,
Her fragrance mesmerises me,
Her words hypnotise me,
A mention of her uncontrollably blushes me !

I get lost when she talks,
I blabber when she asks,
I seem to get my tongue by cat,
Around her, I am overwhelmed !

My eyes always look for her,
My ears yearn for her voice,
My heart beat is always high,
A thought of her give goosebumps !

I am clueless of my actions
I am unaware of my reactions,
I am possessive, jealous, protective,
caring, loving, totally in awe !
A tsunami of emotions engulfs me !

Anxious while waiting,
Fiddling around her,
I m inexplicable !
Since I met her…

Dundee Cake

Almonds gracing it
like beads of necklace.

An orange brown extravaganza
presented itself before us.

Our hungry eyes and
saliva ozing tongues
gazed it inappropriately!

As the triangle shaped piece
rested before me,
I shyingly took one bite
AND WHAT?

It was outbursts of flavours
hunting among themselves
to be recognized at first.

There was cinnamon, lemon,
orange with peels,
nut and raisins and fruits,
soaked in rum.

It was a Christmas party
inside my mouth.

Carols started ringing inside ears
and fragrance came out of my nostrils.

I could relish time
with swirls of my tongue
for every second
before finally gorging it.

The slurpy voices gave away
secret pleasure
which everyone was having
while hogging over the
“Dundee Cake”.

हम तुम

न हम थे तुम्हारे बिन
न तुम थे हमारे बिन
मिले है हम तुम
तो मिल गया है हमदम
न भी रहे हम या तुम
सदा रहेगा हमदम

खरोंचे

गुजर जाने दो इन पलों को
इन पलों का क्या है
हमारी हस्ती तो इतिहास के पटल पर
इन पलों की खरोचों से बनी है

Platonic

Some stories are complete,
even if incomplete

While other story starts,
when two persons meet.
They play ‘I spy’ of a virgin infatuation,
Maturing into romance,
Culminating in love,
Indulging into pleasure,
The story ends on a high note
And marathon of relationship begins!

While all in all,
it is too much effort.
Pandora’s box of both
fulfilled and unfulfilled desires.
Sometimes the runners break down,
Sometimes they continue,
and finish the race
irrespective of scars and stress.

While these stories have to end,
some are complete
without reaching any milestones.
Infact there are no milestones,
no burden of expectations !
It may lack physical intimacy,
but touches emotion deeply !
They are not meant to be culminated, matured or indulged,
but experienced as goosebumps !
Pure, unblemished !
Only responsibility is
to be in each others thoughts.

Unadmitted but apparent !
Not matched but connected !
Away but telepathically proximite !
No need to express but well understood !
Non-existant in materiality !
Invisible like air but necessary !
To be heard like music and absorbed !
To be felt not consummated !
A glance is like meeting of rain and earth, petrichor !
Unaware of future or to say, unbothered !
Transcending seven births in one life !

Unreal and incomprehensible, it may seem
Idiotic and idiosyncratic, it may deem
But that’s what platonic mean…

जब मैं बना धृतराष्ट्र

संतान सुख से अनभिज्ञ, बेपरवाह, भाव शून्य सा
मैं जीवन के पथ पर मंडरा रहा था
लापरवाह, गैरजिम्मेदार
ये बन गए थे चरित्र के आधार

तब मुझे मिली खबर
की जुड़ने वाला है हमसे एक और हमसफर
तो काटने लगे डाक्टरों के चक्कर
मुखातिब हुए जब उस अंश से
बदलने लगे भाव अंतर्मन के
धीरे धीरे जब बनने लगे उसके हाथ पांव
किनारे सी लगने लगी जीवन की नाव

गर्भावस्था नही होती एक महिला के लिए आसान
ये देख और बढ़ गया उनके के लिए सम्मान

आखिर वो दिन आया
हमने रात में खुद को बिना नींद पाया
आनी वाली थी खुशखबरी
पर धड़कने बढ़ी हुई थी दिल की
गई जब वो सर्जरी के लिए
हम तो बस खड़े थे हाथ जोड़े हुए
लगाई फिर डॉक्टर ने पुकार
और रूबरू हुए हम उससे पहले बार
अविश्वसनीय, अविस्मरणीय था वो पल
समझ से परे हो गई थी दुनिया की हलचल

आंसुओ का अंबार भर आया था आंखों में
ये खुशी का बांध टूटा फिर बिना रुके
एक अजब सा एहसास हुआ
जो जीवन में पहले कभी न महसूस किया
उठता था जी घबरा
जब मारता था वो किलकारियां
मन करता है कर दे उसकी हर इच्छा पूरी
लाकर दे दे उसे दुनिया की सारी खुशी
यहीं पल था जब मुझे धृतराष्ट्र से सहनभूति हुई
उसने तो लड़ा बस एक महाभारत
अब मन करता है हिला दे कायनात पूरी

मां

आज मुझे ईर्ष्या हो गई है महिलाओं से
की उन्हे मां बनाया

गर्भ के पहले महीने से ही
वो मां बन जाती है
उसकी अठखेलियों को महसूस कर पाती है
पोषण देकर उसे एक अंश से
मानव का रूप देती है

आसान नहीं होती ये journey
Morning sickness, खाने पर पाबंदी
स्वाद पर पाबंदी, उठने बैठने में परेशानी
Acidity, gas,
sugar, homeoglobin का टेंशन
Figure, maternity weight का risk
लोगों से इतनी नसीहतें, टोका टाकी,
फिर डिलीवरी का दर्द, recovery

पर एक खुशी की उम्मीद
इस journey खुशनुमा फल
एक नन्ही से जान आपकी झोली भर देती है

पर मुझे अब भी ईर्ष्या है औरतों से
की उस बच्चे को आज भी मां ही चाहिए
मां का खुशबू से ही वो चुप हों जाता है
उसके पोषण का जरिया आज भी वही है
वो आज भी मां के ही touch को जानता है

पर मां बनना आसान नहीं
हर दो घंटे में उठ कर दूध पिलाना होता है
नींद उचट जाती, मिजाज में झल्लाहट आ जाती है
खुली आंख से सोना, डार्क सर्कल,
गंदे daiper, बच्चे के सुसु के भीगे कपड़े, चादर, तकिए
ताकत रहित शरीर, उबला खाना,
उसके रोने से शरीर सिहर उठता है
पर मतलब समझ नही आता

फिर एक मुस्कान और उसके चेहरे का सुकून देख
सारी थकान उतर जाती है

मेरी खुशी भी बस अब मां और बच्चे की
मुस्कान और सुकून में है

नादान सा भटूरा

आज कल दफ्तर में Healthy living का प्रचलन हो चला है,
Sprouts, oats, ragi, soya, न जाने कौन कौनसे खाने चल पड़े है,
दादी कहती है ये सब तो हमारे जमाने में गाय भैंसे खाया करती थी,
इस फिटनेस की स्पर्धा से बेफिक्र, एक मनचले ने छोले भटूरे ऑर्डर कर दिए,

लंच में सब टेबल के चारो साथ बैठे और अपने नीरस से टिफिन को देख हताश हो गए,
अब टेबल के बीचोबीच रखे उस नादान भटूरे पर सबकी टकटकी थी,
जिसके एक तरफ छोले महक रहें थे और दूसरी और आचारी प्याज,
जिसको उस मनचले ने सबको ऑफर किया,
एक असमंजस की स्थिति आ गई की
अपने ऊपर थोपे हुए इस waist size और वजन के टारगेट को चुने या
जो लार की सुनामी मुंह में आन पड़ी और जिव्हा के बांध में रुकी हुई है उसकी सुने

आखिर सारे बंधन तोड़ मैने अपना हाथ बढ़ाया
तो किसी ने AK-47 जैसा ताना मारा,
“अरे क्या हुआ तुम्हारी फिटनेस गोल का”
हमने कहा कुछ न होगा एक bite से,
और अपने अंतर्द्वंद को विराम दिया,
हमारे पीछे वो तानेवाला भी लपका एक bite को,
तो हमने AK-56 से ताना मारा,
“क्यों भाई, तुम भी,
तो बोला एक bite से तुम्हारा नहीं कुछ होगा तो मेरा क्या होगा

इसी शर्म और कश्मकश के शिकार सब है,
पर भटूरे की तलब हर तरफ है,
क्या गलती उस नादान से गुलगुल भटूरे की,
जो मुंह फुलाए बैठा है,
अपने संग छोले की टोली लेकर ऐंठा है,
की कब तक करोगे deiting,
बहुत हो गई acting,
तुम से न हो पाएगा
हर पल तरसाऊंगा
फिर मुझे छुप कर खाओगे
और पुराने बहाने बनाओंगे
समझ जायेंगे घरवाले
क्योंकि वो भी खाएं है !

फाइल की कहानी, मेरी जुबानी

आ जाओ
सुन लो मेरी कहानी
मैं एक सरकारी दफ्तर की फाइल हूं
बचपन में मैं बहुत कमसिन सुंदरी होती हूं
नीले, हरे, लाल पेन से मेरा नाम रखा जाता है
शुरू में थोड़े ही कागज होते है मुझमें
जो मेरे अंदर बेल्ट से बंधे जाता है
और रंगबिरंगे flag से मेरा श्रृंगार होता है

कागजों के इंतजार में मैं इधर उधर पड़ी रहती हूं
कोई ज्यादा ध्यान नहीं देता
मजा ही रहता है
कभी कभी एक मोटी बूढ़ी फाइल मुझ पर पटक दी जाती है

धीरे धीरे मेरा पेट भरते है
कागजों का अंबार लग जाता है
और एक वक्त के बाद मेरा पर्यटन चालू होता है
एक साइन फिर दो साइन , साइन पर साइन
इस दफ्तर, उस शहर,
लीगल ओपिनियन, मेडिकल ओपिनिकन
मैं सब जगह से धकेली जाती हूं

कागज बढ़ते चले जाते है
मेरा पेट फटने लगता है
पहले स्टेपलर, धागा
फिर tape , वो भी ब्राउन वाली
इन सब से मेरी मरहम पट्टी की जाती है
उस से भी मेरा इलाज नहीं होता
तो मुझे रस्सी से बांध दिया जाता है

दफ्तर की हर मेज से घूमकर
देश के हर कोने से कागज पत्र इकठ्ठा करने के बाद
फैसले के इंतजार में
मैं किसी बड़े बाबू की अलमारी में
धूल खाती रहती हूं

अचानक से जब किसी जरूरतमंद की गुहार
गुस्से में बदल जाती है
महीने से लटका हुआ फैसले कुछ मिनटों में हो जाता है
और एंबुलेंस की तरह मुझे सारी बत्तियां हरी मिलती है
और अपने सृजन के उद्देश्य को प्राप्त करके
जब मैं अपने रचियता के पास पहुंचती हूं
तो वो मुझे तरस खाती निगाहों से देखता है
किं क्या हाल बना दिया मेरा
फाइल के नाम पर अब कुछ चिथड़े लोथड़े ही बचे है
वो मुझे नया रूप देकर सहेज कर रख देता है
की अभी ऑडिट विजिलेंस भी तो बाकी है इसका