मर्दानगी से metrosexuality तक…

“क्या लड़कियों की तरह रो रहा है?”
“मर्द को दर्द नहीं होता!”
“रो क्यों रहे हो… लड़की है क्या?”

ऐसी बातें सुन कर,
बड़े हुए हैं हम लड़के।

हमें सिखाया गया—
मर्द बनो।
मजबूत बनो।
आँसू?
वो तो कमज़ोरों के लिए होते हैं।

समाज हमें
लोहा बनाना चाहता था।
पर सच बताऊँ?
हम coconut बन गए

बाहर से सख़्त।
अंदर से नरम
जैसे आँसू अंदर रोक लिए हो

दिल में सहानुभूति तो बहुत उमड़ती है,
पर उसे व्यक्त करने से डर लगता है—
कहीं इस फोफली मर्दानगी की दरारों से
मेरी संवेदनशीलता न झलक जाए।

फिर समय बदला।

लड़कियाँ पढ़ने लगीं,
अपनी आवाज़ बनाने लगीं।

वो माँ बनीं,
बहन बनीं,
पत्नी बनीं,
सजनी बनी

और कहीं-कहीं
बस एक अच्छी दोस्त भी बनीं।

और उन्होंने
लड़कों के दिल को
हल्के से छूकर कहा—

कि भाई…
खाली दिमाग से ही नहीं,
दिल से सोचना भी ठीक है।

कि रो लेना बुरा नहीं होता—
आँखें साफ़ हो जाती हैं,
और मन भी हल्का।

कि हर वक़्त गंभीर रहना
कोई महानता नहीं,
कभी-कभी हँसना और हँसाना भी
स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी है।

कि किसी लड़की से बात करने से
वो गर्लफ्रेंड नहीं बन जाती…
वो बस
एक अच्छी दोस्त भी हो सकती है।

और हाँ—
मर्दों का सजना-संवरना भी ठीक है।

facial, manicure, pedicure
तुम भी करा लोगे तो कोई हर्ज नहीं हैं।

गुलाबी रंग
सबका है।

और fashion magazine पढ़ना
कोई सामाजिक अपराध नहीं।

तो जनाब—
ये मर्दानगी से
metrosexuality का सफ़र
इतना मुश्किल भी नहीं है।

असल में…

ये सफ़र
मर्द बनने से
इंसान बनने तक का है।

जहाँ आँसू
मार्मिकता होते हैं।

जहाँ आईने में खुद को सँवारना
खुद से मोहब्बत होती है।

और तब समझ आता है—

कि असली मर्दानगी
दाढ़ी की लंबाई में नहीं,
दिल की गहराई में होती है।

shampoo और conditioner
का फ़र्क जानने में होती है।

साबुन के साथ
facewash, scrub और bodywash
लगाने में होती है।

Boroline के साथ
aloe vera moisturizer
और sunscreen लगाने में होती है।

फिटकारी के साथ
after shave gel लगाने में होती है

matching tie के साथ
colorful socks पहनने में होती है।

action film के साथ
chick flick देखने में होती है।

gym के साथ
कभी zumba करने में होती है।

cricket match के साथ
कभी cooking show देखने में होती है।

रात की पार्टी के बाद
सुबह चाय बनाने में होती है।

और कभी-कभी
खुद के लिए
एक अच्छा perfume चुनने में भी होती है।

असली मर्दानगी
आवाज़ ऊँची करके बात रफ़ा दफ़ा करने में नहीं ,
कंधे पर सर टीकाकर चुपचाप बात सुनने में होती है।

गुजिया की आह

आज मैं गुजिया की तरफ़ से आया हूँ,
आपके द्वारा अपनी दरख्वास्त दर्ज करने आया हूँ,
की ये gen Z की चोचले कब तक सहूँ,
जीते जी मैं कब तक मरु…

पहले मैं थी सीधी-सादी, होली की शान,
Gujiya मेरा नाम, मेरा मान !

चिरौंजी, खोबरा, पिस्ता और बादाम मिल के,
रम कर खोये में और भून कर चाशनी में,
घुस जाते मैदे के लिहाफ़ में,
और सिककर मद्धम आँच पे,
बनती मैं अर्धचन्द्राकार,
रखती थी आपके स्वाद का ध्यान,
वो थे मेरे अच्छे दिन, जब कुछ न थे मेरे अरमान !

हर कौर में होली का उत्साह उमड़ता था,
दादी की रसोई में बचपन घूमता था,
ना कोई fusion, ना कोई फ़िरंगन,
बस सादा सा प्यार और देसी पहचान !

पर अब क्या ढाया मुझ पर ये सितम ?
मिलेट की coating, oats से dating!
कुनाफ़ा के धागे मुझमें उलझाए,
chocolate की नदियाँ मुझ पर बहाए!

कभी Rose flavour, कभी बूंदी,
और अब apple cinnamon, walnut और छेना,
वाह रे इंसान तेरा क्या कहना !
अरे भाई, मैं मिठाई हूँ या lab का project ?
हर साल मुझ पर नया experiment?

ना मैं pizzas हूँ, ना मैं cake,
न दो मुझको reinvention का headache,
मैं तो बस हूँ वो देसी दिलरुबा,
जिसे चाहिए खोया, मेवा और दुआ !

हे मानव ! मेरी सुनो पुकार,
मत डालो मुझ पर trending का भार ।
मुझे रहने दो वही पुरानी,
होली वाली प्यारी रानी !

वरना एक दिन आह भरूँगी,
Air fryer में इस तरह जलूँगी,
मार जाएगी मेरी आत्मा अंदर से,
खेलते रहने मेरी ज़िंदा लाश से…

बस इतना सा है मेरा कहना —
मुझे गुजिया ही रहने देना।

ये दिल है की मानता नहीं !

जवाब मालूम था मुझे
पर ये दिल कहाँ माने
उसे है अभी भी उम्मीदे
की शायद उसकी ज़ुबान
उसकी आँखों और तल्खी का साथ न दे

अपने दिल के सामने मजबूर होकर
आत्मसम्मान को तिजोरी में बंद कर
मैंने उसको पूछा –
“क्या मेरी जीवनसाथी बनोगी”
वो थोड़ी घबरा गई
की कैसे मुझे मुंह पर मना करे
कैसे इसे मेरी बेरुखी न समझे
मैंने फिर पूछा –
“क्या मेरी हमसफ़र बनोगी”
उसे बड़ा ज़ोर लगा कर बोला – “sorry”

जाने कहा हिंदी के बीच अंग्रेज़ी आन पड़ी
शायद ज़्यादा चोट न पहुँचाती हो अंग्रेज़ी
आख़िर वो भी नाज़ुक स्थिति में थी
की मैं भावुक न हों जाऊ
वरना ज़िन्दगी भर मलाल में रहती

जवाब मूझे ज़रूर था पता
फिर भी बुरा लगा
सच्चाई कड़वी तो होती है
आज महसूस भी हुआ

अब दिल शायद समझे
उम्मीदों का दामन छोड़े
मायूस तो हो गया था
एक बार तो धड़कना भी भूल गया
फिर मैंने उसको समझाया
कुछ नहीं हुआ
किसी कोने में छुपा लो उसको
उसकी याद आए तो
ठहर कर ढूंढ लेना
उस कोने में ही मिलेगी हमेशा

फिर ले लेना छुट्टी ‘आज’ से
और जी लेना कुछ पल अतीत में

जहाँ है उसकी खट्टी-मीठी बाते
कुछ पुराने किस्से और अधूरी वादें
झूम लेना खुमारी में साक़ी
अब यही रह गया है बाक़ी

वो chocolate का wrapper…

एक chocolate का wrapper फाड़ा था मैंने

किया उसको आधा ,
मन में था की मिले उसको ज़्यादा
वो कुछ आड़ा-टेढ़ा हुआ
टूटा हुआ एक हिस्सा मैंने offer किया

ठुकरा दिया उसे बड़ी बेरहमी से
बिना देखे , बिना जाने
भला क्या गुस्ताखी की थी उसने

नाराज़गी जो थी मुझसे
गाज़ गिरी chocolate के उस टुकड़े पे

तरस आया उस silky-smooth chocolate पर
की काश ये मैंने न दी होती
तो ये अपने अंजाम तक पहुँच गई होती
मुंह में लार की उफनी हुई लहरो में समा कर
ज़ुबान को अपनी मादकता में मदहोश कर
भेजती तार दिमाग़ की उन नसों को
रोज़मर्रा की कश्मकश में मशगूल थे जो
की जरा ठहरो दो पल के लिए
ये अनमोल स्वाद सहेज लो अनंत तक के लिए

पर ऐसा कुछ होने से पहले ही
वो wrapper फटा रह गया
वो chocolate का टुकड़ा धरा का धरा रह गया

तरस आता है उस chocolate पर
की किसी और के हाथ में होती
तो इतनी बेइज़्जत न सहती

दिल का क्या है
उसे तो ठोकरों की आदत है
पर चॉकलेट के साथ ये नहीं होना चाहिए था

वो टूटे हुए हिस्से
पड़े रहें उस फटे हुए wrapper में
रखा रह है गया जो किसी bag में
वो दोनों हिस्से
अपनी अपनी जगह पिघल गए
wrapper से बाहर भी निकले
पर न कभी जुड़ पाए न जुदा हो पाये

शायद रही होगी उसकी भी कोई मज़बूरी
वरना कौन बनाता है chocolate से दुरी
पर एक बार दिल की बात तो साझा करती
मुझे लायकी साबित करने का मौका तो देती
बिना चखे तो chocolate का स्वाद भी नहीं समझाता
ये तो इश्क है जनाब
खाली लिफाफा देख, दिल थोड़े है धड़कता

अगर वो wrapper कभी फटता ही नहीं
ये दिल कभी ऐसे किसी के लिए धड़कता ही नहीं
पड़ी रहती वो chocolate उस wrapper में ही
इसके टुकड़े भी न होते कभी
अब टूटे हिस्सो को कैसे जोड़े
अब chocolate दोबारा कैसे खाये
दिख भी जाती है इश्तेहार में कहीं
उभर आती है तस्वीर उस wrapper की फटी हुई

काश वो chocolate कभीं ख़रीदी न होती
काश वो ज़िन्दगी में आई भी न होती
ख़ुश था मै बिना जाने की chocolate है
ख़ुश था मैं बिना जाने की इश्क़ जैसा कोई एहसास भी है

वो chocolate का wrapper आख़िर क्यों फाड़ा था मैंने

दिवाली की मिठाइयाँ

ये त्योहारों के आते ही कढ़ाई चढ़ जाती है
पहले नवरात्रो में कुट्टू की पकौड़ी
अष्टमी नवमी पर हलवा चना पूरी
करवाचौथ पर फिर पूरी
होई पे फिर पूरी
दिवाली पर फाइनल पिट्ठी वाली पूरी
गोवर्धन कर अन्नकूट और कढ़ी
भाई दूज के बाद पेट पूरी जैसा ही फुल जाता है

बहुत मिठाइयाँ भी खायी जाती है
अब मिठाइयों का प्रकार बदलने लगा है
पहले लड्डू होता था
अब लड्डू cheesecake होता है
milk cake की जगह trifle pudding
बर्फी की जगह बकलावा, कुनाफ़ा
पकोड़े की जगह fritters and macain fries
और चाय-coffee की जगह mocktails

खादी की जगह अब manyavar की दीवाली होने लगी है
दीयों की जगह automatic chinese light ने ले ली है
मोमबत्तियाँ ने भी भाँति भाँति के आकर ले लिए है
अपनी गंध छुपाने के लिए नए scent लगाने लगी है

बुरादों के रंग की जगह रंगों की पेंसिल आ गई है
दिवाली भी रंगबिरंगी की जगह green होने लगी है
पटाखों का शोर अब दिवाली से महीने पहले
news channel पर सुनाई देने लगता है
बम से तेज तो anchor की आवाज़ हो गई है

भले ही दिवाली बदल रहीं ही
पर मेरी दीवाली अभी भी वही पुरानी है
घर लौट कर, अपने शहर, अपने घर,
अपने माता-पिता, अपने दोस्तों के साथ
क्यूंकि दिवाली बनायी भी तो घर लौटने की ख़ुशी में है न
जब रामजी अपने घर अयोध्या लौटे थे

बस हम हर साल लौटते है
ख़ुद से ही रंगोली, झालर और घर सजाते है
वापस उन जड़ों पर लौटते है
जिसके एक टहनी अभी इस कैफ़े में है

पुराने दोस्तों से मिलकर नए किस्से बाँटते है
बड़प्पन की परत के नीचे छुपे हुए
बचपन और लड़कपन को फिर जगाते है
उन पुरानी यादों को
उन पुरानी गलियों और ठियो पर गेड़िया मार
फिर जीते है

कुछ ज़ख़्म और कुछ हसीन यादें
अतित के पर्दे से झाँकती है
और ये एहसास दिलाती है
की हम कितने भी बड़े हो जाए

पर सुधरेंगे नहीं
आज भी स्कूल के सामने
लड़िया जलाने के इच्छा तीव्र है
गलियों में छिप पटाखे वाली बन्दूक से
चोर पुलिस से खेलने का मन करता है
बाल्टी और रेट का टीला देख
उसके के नीचे बम जलाने का ही मन करता है
Bottle की जगह सड़क पर रॉकेट जलाने का मन करता है
और गाड़ी को देख रोहित शेट्टी की तरह उड़ाने का मन करता है

आज भी घर से फ़ोन आता ही
की कब तक आओगे
बस तब माँ- बाप करते थे
अब ये कमान उन्होंने पत्नी को दे दी है

बचपन

देख कर अपने बेटे को
ख़ुद को मैंने अतीत में खोया पाया
बचपन की यादों का
झुरमुट उमड़ आया

छुपन छुपायी ने जहाँ खोले मोहल्ले के कई राज
कबड्डी खेलकर हुआ लड़ाइयो का आग़ाज़

कोना कोना खेलते हुए गिरे नाली में कई बार
चोर पुलिस में बने ACP प्रदुमन बार बार

आता जो भी world cup
हम कर देते पढ़ाई ठप
जब न मिलता था किसी का बैट या बाल
ठीक करा लेते थे पुरानी फुटबॉल

होली पर होती थी गुब्बारों के बौछार
दीवाली पर मचता था बम से हाहाकार

कभी हमने किए रावण के लिए पैसे इकट्ठे
कभी समर क्लब बना कर बने entrepreneur कच्चे

टूटते थे जब घरों के शीशे
तो हो जाता था मामला गंभीर
छुप जाते थे सारे लड़के
की कोई पकड़ के न दे पीट

पर tension उससे थी ज़्यादा बॉल लाने की
रुके हुए मैच में अपनी बैटिंग पूरा करने की

birthday party का भी उत्साह अलग था
जहाँ passing the pass में ही talent दिखाना पड़ता था
फिर आता था वो most awaited नाश्ता
जहाँ होता तो था pastry, समोसा और रसगुल्ला
पर सब मिल बन जाता था रंगबिरंगा पास्ता

साइकिल होती थी हमारी शान
घूमते थे हम जिसपर सुबह शाम
नाप दी थी सारी गालियाँ और मोहल्ले
बस ऐसे ही बीत गया बचपन
social media पर बिना मचाये हल्ले

ये कलम

कुछ दिनों से कलम स्याही में भिगोता हूँ
और सोचते सोचते
वो स्याही के धब्बे काग़ज़ पर सूख जाते है
पर कोई ख्याल या शब्द ज़हन में न फूटता
सोचा की इस बार फिर क़ुर्बानी लेगा क्या
ये कलम चलने के लिए

मैंने कुछ समय क़ुदरत के बीच गुज़ारा
कुछ किताबों के सफ़हे पलटते हुए
तो कुछ संगीत और शायरी सुनते हुए

पर मुझे पता था ये कलम ऐसे नहीं मानेगा
इसे कुरबानी मेरे दिल की ही लगेगी
न जाने और कितने टुकड़े करेगा ये कलम इस दिल के
पूछता हूँ तो कहता है –
“बस थोड़ी खरोंच ही सहन करनी पड़ेगी
मेरी स्याही से निकले जज़्बात
तुझ पर मरहम का काम करेंगे”
उसे कौन समझाये की ज़ख़म भले ही भर जाते है
पर एक अमिट निशान छोड़ जाते है

उसकी जिद के आगे हारकर
फिर मैंने अपना दिल तोड़ा
एक पत्थर पर मार कर
दर्द तो बहुत हुआ
पर एक सुकून भी मिला
की ये दर्द कलम से निकल जाएगा…

तबादले की चिट्ठी

भवानी राम की चिट्ठी आ गई थी
उसे मेरठ से आगरा तबादला कर दिया था
रुकवाने की अर्ज़ी डाली
पिताजी ने एक मंत्री से भी बात की
चिट्ठी में चिठ्ठी के मिलने के पंद्रह दिन में आगरा पहुंचना था

भवानी राम इंतज़ार में था की इन पंद्रह दिनों में
उसका तबादला रुक जाए
क्यूँकि उसकी शादी थी एक महीने में
नई बहू के साथ नई जगह गृहस्थी जमाना आसान नहीं होगा
ये उसे मालूम था
इसलिए तबादले के रुकवाने के लिए बेचैन था

पंद्रह दिन गुज़र गए
कोई चिट्ठी नहीं आई
भवानी राम को आगरा जाना पड़ा

उसके जाते ही दो चिट्ठी आई
मेरठ वाले दफ्तर में
तो सहकर्मियों ने उत्सुकता से दोनों खोली
की पता नहीं किसमें तबादला रुक गया हो

पर पहली चिट्टी सोनसी की थी
उसकी होने वाली पत्नी
इत्र की ख़ुशबू भी आ रही थी
इस ख़ुशबू में वो सब तबादला वैगरह भूल गए
और चिट्ठी पढ़ने लगे
उसमे बहुत सारी प्यार भरी बातें लिखी थी
“की आपका पिछली चिठ्ठी मिली
उसे पढ़ कर रोम रोम खिल उठा
आप बहुत नटखट है !

(चिठ्ठी के वही अंश पढ़े जा रहे है
जो पढ़े जा सकते है,
सारी बातें यहाँ पब्लिक में बताना उचित नहीं )

मैं भी आपके लिए बहुत कुछ सीख रही हूँ
ऑफिस से आपके आने इंतज़ार करना भी
शाम को अलग अलग तरह के शरबत बनाना भी सीख रही हूँ

पर अभी तो मुझे बस आपकी बारात का इंतज़ार है
घोड़े पर बैठे आप राजा लगेंगे
और मूछों में रौबदार
बस डर रही हूँ की ये मुछे कितना चुभेगी
कम से कम आप दाढ़ी तो नहीं रखते

आप तबादले की ज़्यादा चिंता न करे
मैं पूरा घर संभाल लुंगी
और हम दोनों ही होंगे
तो गृहस्थी भी सीमित होगी
इतना क्या परेशान होना

हम रोज़ ताज महल देखने जाया करेंगे
उसी खिड़की से ताज महल देखेंगे
जिस से शाहजहां देखता था
आप लाल किले पर रहना
मैं ताज महल में रहूँगी

रात की चाँदनी में ताज देखेंगे
जहाँ एक तरफ़ यमुना में
ताज महल की परछाई होगी
दूसरी तरफ़ हमारी

मैं रोज़ नए नए व्यंजन बना कर आपको खिलाऊँगी
आप बोर ही नहीं हों पाया करोगे
अगली चिठ्ठी में बताना की क्या रहा”

ये पढ़ने में दफ्तर वालो को खूब मज़ा आया
फिर दूसरी चिट्ठी खोली तो पता लगा की तबादला रुक गया है
वो चिट्ठी दस दिन देर से आयी थी
उन्होंने दोनों चिट्ठी आगरा भेज दी

भवानी राम आगरा के दफ़्तर पहुँचे
बेमन से कुर्सी पर बैठे हुए थे
न तबादला हुआ न सोनसी की चिठ्ठी आई
मुंह लटक कर मुमताज़ की कब्र तक पहुँच गया था
और रुके हुए आंसुओं का वेग
भाकरा-नागल डैम के पानी की तरह था

जॉइन किए दस दिन हो गये थे
शादी की छुट्टी के लिए फिर मेरठ जाना का दिन आ गया
इतना लटका हुआ चेहरा देख बाबू ने भी जाने दिया
उसके जाते ही अगले दिन दोनों चिट्ठी आगरा पहुँची
उत्साह में फिर दोनों चिट्ठी खोली गई
की कौनसी तबादले की है
फिर उन्होंने सोनसी की चिठ्ठी पढ़ी
और मज़े लिए

उन्होंने दोनों चिठ्ठी इस बार
भवानी राम के घर भेज दी
शादी पाँच दिन बाद थी
चिट्ठियाँ नहीं पहुँची
पर आगरा और मेरठ के दफ़्तर वाले शादी में पहुँच गए
उन्होंने भवानी राम से कहा
“की भाई दाढ़ी मत रखता
और मुछें रखना पर बहुत पैनी नहीं
चाहो तो तबादला ले ही लो
क्यूंकि भाभीजी को ताज महल घूमना है”

उसे कुछ समझ नहीं आया
शादी हो गई पर तबादले रुकने की चिट्ठी नहीं पहुचीं
न ही सोनसी की, जिसका जवाब देना था

अब चिट्ठियों का तो ऐसा ही है
इतनी देर से आती है
की कभी कभी तो बच्चे हो जाते है
लोग retire हो जाते है
पर चिट्ठियाँ नहीं पहुँचती

किट्टू

ये नाम है मेरे cutie pie का
जब आया था छोटू सा था
सिर एक टहनी और कुछ पत्ते
इत्तू सा गमला

इसको मैंने sunlight दिखायी
पानी पिलाया
और खाना भी दिया
organic खाद !

मैंने घर पर ही बनायी थी
सब्ज़ी के छिलके और used चाय पत्ती से
कूड़े वाले भैया तो बोलने लगे
की तुम तो मेरे लिए कूड़ा ही नहीं छोड़ती हो

धीरे धीरे मेरा kittu बड़ा हुआ
उसके नए टहनी और पत्ते आए
वो इत्ता बड़ा हो गया की
नया planter लाना पड़ा

मैंने ceramic का
hand painted pot लिया
और kittu को नई मिट्टी में shift किया

kittu के नए घर की
housewarming party भी करी
सबने kittu को थोड़ा थोड़ा पानी दिया
फिर उसके साथ picture click करी
नया hashtag भी बनाया #growlikekittu

Snack में सिर्फ़ herbal tea
और fresh fruits थे
उनके remains से मैं
kittu का और खाना बनाऊँगी

अब बस kittu और बड़ा हो जाए
फिर kittu के भाई बहन भी लाएंगे
पूरा family garden बनायेंगे

रेल यात्रा

दोस्ती सी हो गई थी रेल से
हर हफ़्ते घर जाना होता था
सीट , ट्रेन , टिकट सब तय था
बस अनुभव नये थे

जनरल डिब्बा अपने आप में
एक कस्बे का नुक्कड़ है
जहाँ हर इंसान के पास एक मशविरा है
और एक शेखी बघारता क़िस्सा

एक बार एक इंसान को घिसड़ लग गई
तो हर आदमी ने इलाज बताया
इतना ज्ञान तो शायद medical science में भी नहीं होगा
की इलाज के सामने चोट छोटी पड़ गई

एक दफ़ा सुबह की ट्रेन ले ली
पौ भी नहीं फटी थी
सोचा रात की अधूरी नींद पूरी कर लू
नहीं तो रात तक उधर रहेगी
तो पूरा दिन उबासी लेकर सूद चुकाना होगा

जैसे ही एक झौका नींद का आया
तो लगा की सपने में मैं झरने में नहा रहा हूँ
पानी का बहाव इतना तेज हो गया की
मेरी आँख खुल गई
तब ज्ञात हुआ की ये झरना का स्रोत
एक शिशु था
वो भी सोते हुए ना जाने सपने में क्या देख कर
मूत्र विसर्जन कर रहा था
की ऊपर की बर्थ के लकड़ी के फट्टो के बीच से
मुझे सपने से उठा रहा था

हल्ला मचाया तो माँ भी नींद से जागी
फिर चारो तरफ़ से सलाह बरसने लगी
एक काम के इंसान ने paper soap दिया
तो मैंने मुंह धोया
पर उस भीड़ मैं इतना ही कर पाया
और सोचा शायद बाल condition हो जाए
इस सकारात्मक सोच के साथ
मैंने बाक़ी का सफ़र पूरा किया

कभी कभी सफ़र में हमसफ़र भी मिल जाता है
पर मुझे एक पुराना दोस्त मिला
दीवाली का मौसम था तो
एक पुरानी सहपाठी भी मिली

हमने सोचा चलो सफ़र अच्छा कट जाएगा
क्या पता होली तक जीवन में रंग भर आयेगा
पर भगवान फूल के साथ कांटे भी देता है
जैसा मेरा दोस्त
और वो कांटा नहीं दीवाली का पटाखा निकला
उसने बिना जाने मेरी सहपाठी को
न जाने cool college life का क्या पाठ पढ़ाया
की मैं तो बस आते जाते बेचने वालो की
canvassing करता नज़र आया

मैंने उन दोनों को coffee पिलाई
जैसे मैं था लड़की का भाई
That day I realised lot can happen over coffee
चाहे वो CCD की भी न हो

वो ट्रेन यात्रा यादगार बन गई
उनके लिए
जब उनकी फ़ोटो मैंने
कुछ सालों बाद instagram पर देखी
एक दूसरे को रिंग पहनाते हुए
और मुझे tag करते हुए
saying thank you Prateek
For matching us
You are Cupid !

एक बार को ऐसा लगा की
Anupam Mittal बन जाऊ
दूसरो की शादी करा कुछ पैसे कमाऊ

ख़ैर उस ट्रेन से मैंने घर जाना छोड़ दिया
जिसे उस couple ने love express नाम दे दिया
भला हो मोदी का उसने वंदे भारत चलायी
क्यूंकि मुझे love express सुन कर ही उल्टी आती

अब कोई लड़की बैठ भी जाए बराबर में
मैं focus करता हूँ बस खेत देखने में
वो भी टोपी पहन कर
की कहीं ट्रेन के अंदर
फिर बरसात न आ जाए कहीं से