नादान सा भटूरा

आज कल दफ्तर में Healthy living का प्रचलन हो चला है,
Sprouts, oats, ragi, soya, न जाने कौन कौनसे खाने चल पड़े है,
दादी कहती है ये सब तो हमारे जमाने में गाय भैंसे खाया करती थी,
इस फिटनेस की स्पर्धा से बेफिक्र, एक मनचले ने छोले भटूरे ऑर्डर कर दिए,

लंच में सब टेबल के चारो साथ बैठे और अपने नीरस से टिफिन को देख हताश हो गए,
अब टेबल के बीचोबीच रखे उस नादान भटूरे पर सबकी टकटकी थी,
जिसके एक तरफ छोले महक रहें थे और दूसरी और आचारी प्याज,
जिसको उस मनचले ने सबको ऑफर किया,
एक असमंजस की स्थिति आ गई की
अपने ऊपर थोपे हुए इस waist size और वजन के टारगेट को चुने या
जो लार की सुनामी मुंह में आन पड़ी और जिव्हा के बांध में रुकी हुई है उसकी सुने

आखिर सारे बंधन तोड़ मैने अपना हाथ बढ़ाया
तो किसी ने AK-47 जैसा ताना मारा,
“अरे क्या हुआ तुम्हारी फिटनेस गोल का”
हमने कहा कुछ न होगा एक bite से,
और अपने अंतर्द्वंद को विराम दिया,
हमारे पीछे वो तानेवाला भी लपका एक bite को,
तो हमने AK-56 से ताना मारा,
“क्यों भाई, तुम भी,
तो बोला एक bite से तुम्हारा नहीं कुछ होगा तो मेरा क्या होगा

इसी शर्म और कश्मकश के शिकार सब है,
पर भटूरे की तलब हर तरफ है,
क्या गलती उस नादान से गुलगुल भटूरे की,
जो मुंह फुलाए बैठा है,
अपने संग छोले की टोली लेकर ऐंठा है,
की कब तक करोगे deiting,
बहुत हो गई acting,
तुम से न हो पाएगा
हर पल तरसाऊंगा
फिर मुझे छुप कर खाओगे
और पुराने बहाने बनाओंगे
समझ जायेंगे घरवाले
क्योंकि वो भी खाएं है !

फाइल की कहानी, मेरी जुबानी

आ जाओ
सुन लो मेरी कहानी
मैं एक सरकारी दफ्तर की फाइल हूं
बचपन में मैं बहुत कमसिन सुंदरी होती हूं
नीले, हरे, लाल पेन से मेरा नाम रखा जाता है
शुरू में थोड़े ही कागज होते है मुझमें
जो मेरे अंदर बेल्ट से बंधे जाता है
और रंगबिरंगे flag से मेरा श्रृंगार होता है

कागजों के इंतजार में मैं इधर उधर पड़ी रहती हूं
कोई ज्यादा ध्यान नहीं देता
मजा ही रहता है
कभी कभी एक मोटी बूढ़ी फाइल मुझ पर पटक दी जाती है

धीरे धीरे मेरा पेट भरते है
कागजों का अंबार लग जाता है
और एक वक्त के बाद मेरा पर्यटन चालू होता है
एक साइन फिर दो साइन , साइन पर साइन
इस दफ्तर, उस शहर,
लीगल ओपिनियन, मेडिकल ओपिनिकन
मैं सब जगह से धकेली जाती हूं

कागज बढ़ते चले जाते है
मेरा पेट फटने लगता है
पहले स्टेपलर, धागा
फिर tape , वो भी ब्राउन वाली
इन सब से मेरी मरहम पट्टी की जाती है
उस से भी मेरा इलाज नहीं होता
तो मुझे रस्सी से बांध दिया जाता है

दफ्तर की हर मेज से घूमकर
देश के हर कोने से कागज पत्र इकठ्ठा करने के बाद
फैसले के इंतजार में
मैं किसी बड़े बाबू की अलमारी में
धूल खाती रहती हूं

अचानक से जब किसी जरूरतमंद की गुहार
गुस्से में बदल जाती है
महीने से लटका हुआ फैसले कुछ मिनटों में हो जाता है
और एंबुलेंस की तरह मुझे सारी बत्तियां हरी मिलती है
और अपने सृजन के उद्देश्य को प्राप्त करके
जब मैं अपने रचियता के पास पहुंचती हूं
तो वो मुझे तरस खाती निगाहों से देखता है
किं क्या हाल बना दिया मेरा
फाइल के नाम पर अब कुछ चिथड़े लोथड़े ही बचे है
वो मुझे नया रूप देकर सहेज कर रख देता है
की अभी ऑडिट विजिलेंस भी तो बाकी है इसका

आशिक की सर्दी

जनवरी की वो सर्द रातें,
और ठंडी हो जाती है,
जब तन्हाई में इंसान,
करवटे बदलता है ।

अलाव की गर्माहट,
राजई की नरमाहट,
अकेलापन के आगे,
कोहरे में धुंआ हो जाती है।

गीज़र का गरम पानी
बर्फ सरीखे दिल पर
बेअसर हो जाता है ।

बेरुखी, धोखे और इंकार
से जमी भावनाओं पर
ग्लोबल वार्मिंग का
भी असर नही होता ।

ये इश्क में चोट खाये
आशिक़ की सर्दी है,
इसे सिर्फ सच्ची मोहब्बत
की दरकार है ।

Invitation to concert of death !

Hey,

I am that lucky bastard
Who got to know his time of death
Now that wails have mellowed down
Let’s bid farewell in style

Here is the invitation
To the party of my life
Welcome all
Family and friends
And those
Who have touched my life
Even a little bit

Share your stories and grievances
I know I am nice
But not so nice
Let’s clean the slate
Or balance the balance sheet
Between us
So that my soul is not heavy
And won’t bother you as ghost

Come one, come all
To the celebration of death
A gala, one of its kind
Going on for a week
There will be
Quiz about me
Food of your choice
Games of transcendence
Surprise of love

Waiting to host you
One last time
Be the cherry of event
And make merry of it

Lovingly yours
Roy

Someone

Sometimes you miss someone
To whom you can talk
Instead you start talking with yourself

When you get bored of yourself
You start taking with anyone
Who is not the one

It may think of you
Depressed or desperate
But definitely weird

Someone won’t judge of you being weird
If you can be yourself
Then someone is the one

होली की हमजोली

दशक बीत गया गुलाल गालों को छुए,
पढ़ाई, नौकरी, उन्नति, की व्यस्तता में,
जीवन से रंग उड़ गए,

क्या दिन थे वो,
होलिका दहन से ही
मस्ती का आगाज़ हो जाता था,
एक तरफ टेसु के फूल पकते थे,
दूसरी ओर हलवाई की कढ़ाई से
पकोड़ो की खुशबु भीनभीनाती थी,
हमारी कॉलोनी में कौन रहता है,
उसी दिन ज्ञात होता था,

और अगले दिन
स्कूल के लिए नाटक करने वाले बच्चे,
फागुन के दिन सुबह उठ कर,
पिचकारी को बंदूक सरीखे तैयार करते थे,
ग्रेनेड की तरह पानी के गुब्बारों को भरते थे,
बाल्टी में घुला रंग तो बारूद होता था,
शालीन दिखने वाले पढ़ाकू चश्मीश भी,
हाथापाई होने पर,
गुलाल और पक्के रंगो से लहूलुहान हो जाते है,
आलम ये होता था की
माँ अपने बच्चों को नही पहचान पाती थी,

दोस्तों का जब हुजूम निकलता था,
हिमस्खलन के गोले के तरह,
आकार में बढ़ता ही जाता था,
न जान पहचान,
बस रंग का रिश्ता था,
गीले शिक़वे पानी में धुल जाते थे,
जिसके घर जाते, व्यंजनो से स्वागत पाते,
वो गुंजिया, ठंडाई, इमली के भल्ले,
अब तो बस मुँह में पानी लाकर छोड़ देते है,

रंगों के सुरूर में लिप्त,
शाम को मेले में बैंगानी और गुलाबी चेहरे,
होली के हुड़दंग का साक्ष्य देते थे,
थके हारे सब किस्से कहानियां सुनते,
नई रिश्ते, यादें बना,
फिर जीवन ने मगन हो जाते,
ऐसी थी होली की हमजोली !

Pressure cooker

When we are young,
Whole world is at arm’s length,
Imitating as Pilot, Doctor,
Astronaut, Scientist,
Artist, Player, Writer,
Are our leisure games,
Because
Everything seems achievable,

As we enter the pressure cooker,
The steam of life,
Start working it’s wonder,
It softens the goal
To a nine to five job

The first whistle is of school,
Homework, toppers, peer pressure,
Suggestions from all directions,
Develops confusion,
With fear of failure,
You loose hope,

The second whistle is of college,
When we have exposure blast,
With no discipline policing,
We indulge in bad habits,
And revolve around,
Banging our head on wall,

The third whistle is of job,
Where you find no link,
Between your past and present,
Education suddenly becomes useless,
Life becomes a timetable,
Chasing after materialistic goals,

The fourth whistle is marriage,
Settling down with wife,
With responsibilities on shoulder,
We put off the gas and let it cook,
With hobbies on back burner,

After the cooling off period,
Suddenly your silver jubilee occurs,
Kids bring back old memories,
And you open a Pandora’s box of aspiration,
And realise that when lid is finally removed
Life has become a potpourri !

अकेलापन

मादकता का एहसास
देने लगा है अकेलापन,

तरन्नुम में सुबह को उठता हूँ,
दिन भर अपनी धुन में रहता हूँ,
रात को मदहोशी में सो जाता हूँ,

बेखौफियत आ गयी है मिज़ाज़ में,
भभकिया नज़र आती है धमकियों में,
बंधा नही हूँ किसी ज़िम्मेदारी में,

ख्याल अपना रखता हूँ,
अपने से ज़्यादा परिवार का सोचता हूँ,
समाज और देश के लिए चिंतिंत रहता हूँ,

क्योंकि स्वार्थ नही रहा जीवन में,
करता हूँ शौक पूरे आपने,
ध्यान इसका रखता हूँ,
कोई परेशान न हो मेरे अकेलेपन से,

बस यही समस्या समाज की है,
कोई खुद में खुश क्यों है ?
हमने जो रास्ता चुना,
तुम उस से अलग क्यों है ?

मर्दानगी

मर्द को दर्द नही होता,
क्योंकि वो अपना दर्द,
औरत पर निकाल देता है,
डांट कर, मार कर, रुला कर,
आवाज़ दबा कर, भूला कर,
ज़बरदस्ती कर, छोड़ कर,
चाहे वो पत्नी हो, बेटी हो,
बहन हो, माँ हो, रिश्ते में हो,
या कोई अनजान ही हो,

किसी लड़की ने ठुकरा दिया,
महिला बॉस ने कुछ बोल दिया,
बीवी ज़्यादा कमाने लग गयीं,
या बाजार में ही किसी ने
दो टूक शब्दो में आईना दिखा दिया,
तो मर्दानगी के गुब्बारे में
पिन चुभ जाता है,
अहंकार को ठेस पहूँचती है,
इतनी की वो अच्छाई भूल जाता है,
बस मर्दानगी को ध्यान रखता है,
घृणा में अंधा होने लगता है,
क्रोध में आगबाबुल हो जाता है,
जघन्य अपराध तक कर बैठता है,

पर ये कुछ नही,
मर्द तो हर चीज़ का गुस्सा औरत पर उतरते है,
दफ्तर का, अपनी विफलता का,
बच्चो का, रिश्तेदारों का,
जैसे वो एक थैला हो,
अपनी कमज़ोरियां छुपाने का,
अपने दंभ को बल देने का,

समझ नही आता ये कैसी मर्दानगी है,
ये कैसा पौरुष है,

मेरा घर, मेरा मायका

आज जब धूप की चोंध से आंख खुली,
घर फैला देख सुकून की अनुभूती हुई,

कोई चीज़ ढूंढने की ज़रूरत नही थी,
सब बाहर ही बिखरी पड़ी थी,

शांति के सुरूर में खोया हुआ,
सप्ताहांत आनंदमय रहा,

तभी पिताजी का फोन आया,
हमने तरन्नुम में कॉल उठाया,

उन्होंने अपने आने की सूचना दी,
तूफान से पहले की शांति भंग हुई,

दीवार पर भागती छिपकली को देखा,
आने वाले चक्रवात का हुआ अंदेशा,

मकड़ियों से माफी मांगनी पड़ी,
जब उनके जालो पर झाड़ू रूपी बुलडोज़र चलाई,

किचन में भी खूब कोलाहल मचाया,
काफी चीज़ों को खाद में बदला पाया,

बाथरूम, बेसिन, चादर सब धो डाला,
साफ घर मुझको भी रास आया,

आखिर माता पिताजी पधारे,
खुशी में हमने व्यंजन पका डाले,

उनके पैमानों पर घर खरा न उतरा,
हमारी मेहनत पर पानी फिर गया,

सब जन्तुओ का बलिदान व्यर्थ गया,
जब सुदूर कोनो में भी मैल ढूंढा गया,

पंखे को लेकर बहूत बवाल हुआ,
वो भी साफ होता है ये तभी ज्ञात हुआ,

माँ के पकवान और पिता के प्रवचन में,
न जाने कब दस दिन निकल गए,

आखिर उनके जाने की बेला आयी,
छुपा हुआ सामान निकाल कर आज़ादी मनायी,

ये स्वतंत्रता ने भी गजब ढहा,
जब माता पिता सास ससुर,
और गृहनगर ससुराल लगने लगा ।