पर्यावरण की पंखुड़ियां करती है पुकार,
इतनी बेदर्दी से न करो हम पर अत्याचार,
कल कल करते निश्छल पानी को
कारखानों के ज़हर ने मलिन कर दिया,
हरे वृक्षो के घने जंगलों को,
सूखे तनो का कब्रिस्तान कर दिया,
पवन के मदमस्त शीतल झोंको को,
काले धुंए का बादल बना दिया,
रात के टिमटिमाते आसमान को,
अंतरिक्ष से भी गहरी गुत्थी कर दिया,
लहलहाते हरे-पिले खेतो को,
विषाणुओ से ग्रस्त कर दिया,
वन के पराक्रमी जन्तुओ को,
किताबो की तस्वीरों तक सीमित कर दिया,
बस अब बहुत हुआ अत्याचार,
न् भर ले प्रकृति ऐसी हुंकार,
खोल ली अगर तीसरी आंख
तो दिखा देगी अपना रौद्र रूप,
सुनामी, भूकंप, बाढ़ एंव भूस्खलन से,
पड़ जाएगा अस्तित्व मनुष्य का खतरे में,
इस से पहले खत्म हो जाए संभालने का समय,
बनाना होगा हम सबको यह ध्येय,
करेंगे रक्षा प्रकृत्ति की खुद से बढ़कर,
रखेंगे भू के कण कण को सहज कर,
स्वच्छ करना होगा पृथ्वी, जल और वायु को,
और गिन गिन कर उपयोग करना होगा संपदा को,
क्योंकि पर्यावरण की पंखुड़ियां करती है पुकार,
इतनी बेदर्दी से न करो हम पर अत्याचार,









