आज गायत्री निवास सजा हुआ है । आंगन से छत तक रोशनी झिलमिला रही है । पूरी गली के लोग अपनी घरों से निकल कर शादी के उत्सव में भाग लेने जा रहे है । जैसे छोटी-छोटी धाराएं जलाशय में मिल जाती है । शहनाई की गूंज से वातावरण मुदित हो गया है । व्यंजनों की कतार को कोई अंत नज़र नही आ रहा है । परिवार के लोग मिलजुल कर यादें बना रहे है ।
तभी दुल्हन के स्वागत सुर बजते है । भाई फूलो की चादर की नीचे बहन को जीवनसाथी से मिलने ले जा रहे है । सब दुल्हन की एक झलक पाने को ललक रहे है । दूल्हा टकटकी बांधे आस भरी नज़रो से अपनी भावी पत्नी का इंतज़ार कर रहा है । उसके दोस्त, बहने, भाभियां उसको छेड़ रहे है । नोकझोंक के बीच वरमाला सम्पन्न होती है । अब फेरो की रस्म शुरू होगी ।
फूलों से सजे मंडप में,
अग्नि के समक्ष,
वैदिक मंत्रोउच्चारण में,
सबके आर्शीवाद के बीच,
घर की लाडो रानी,
आज परायी हो जाएगी,
वजन बहूत था पर,
गहने और लहँगे का नही,
सामाजिक ढर्रे का,
सजा दी जा रही थी उसे,
बिरादरी के कानून तोड़ने की,
कैद थी वो इस लिबास में,
मंगलसूत्र जैसे फांसी हो,
पंडित एक जल्लाद,
और मेहमान पुलिस वाले,
उसके मन मे द्वंद के स्वर दे,
और मौत की वो चीख,
जो उसे कचोट रही थी,
अग्नि को देख,
जौहर की इच्छा जगती थी,
जल चढ़ाने की बात सुन,
आंख छलक आती थी,
बूत तो उस दिन ही बन गई थी जब उसके पिता ने इसी आंगन में खाप के आदेश का पालन करते हुए उसकी बहन को उसके ही प्यार के साथ मार दिया था । आज उसकी रूह का क्रियाक्रम है ।
उस नज़ारे से वो सहम गई थी । ज़िन्दगी और मोहब्बत में उसने ज़िन्दगी को चुना । चाहे ज़िंदा लाश ही सही !