बड़ी आस थी प्यार में गिरने की,
जब हुआ तो खुद की नज़रो में गिर गया,
वो प्यार नही, प्यार का पिंजरा है,
कहते है उनकी हाँ में मेरी हाँ है,
उनकी ना में मेरी ना है,
मेरी अब न हाँ है न ना है,
मेरा सही भी गलत है,
उसका गलत भी सही,
न जाने क्यों
अब गलतियां सिर्फ मैं करता हूँ,
मेरी ख्वाब कब बदल गये,
उसकी ख्वाहिशों में तब्दील हो गए,
इल्म ये मुझको भी नही है,
प्यार कब मेरा हवस बन जाता,
कब वो काफी नही रहता,
अब ये उसका ही फैसला है,
मैंने खुद को बदल लिया,
तुम पहले जैसे नही रहे
ऐसा उसने कहा,
बेबस होकर भी गुनहगार मैं ही हूँ,
छोड़ना चाहूँ या रिश्ता तोड़ना चाहूँ,
आँसुओं से पिघल जाता हूँ,
मोहब्बत की माया में बंध जाता हूँ,
समझौतो से गुरेज़ नही,
इश्क़ में फना होने का भी गम नही,
पर शरीर आत्मा पर बोझ मंजूर नही,
अब इन ठंडे फसलों को,
दूरियों की ताप देनी होगी,
नही तो, सुन्न हो ही गया हूँ,
किसी दिन एकाएक शिथल पड़ जाऊंगा