मादकता का एहसास
देने लगा है अकेलापन,
तरन्नुम में सुबह को उठता हूँ,
दिन भर अपनी धुन में रहता हूँ,
रात को मदहोशी में सो जाता हूँ,
बेखौफियत आ गयी है मिज़ाज़ में,
भभकिया नज़र आती है धमकियों में,
बंधा नही हूँ किसी ज़िम्मेदारी में,
ख्याल अपना रखता हूँ,
अपने से ज़्यादा परिवार का सोचता हूँ,
समाज और देश के लिए चिंतिंत रहता हूँ,
क्योंकि स्वार्थ नही रहा जीवन में,
करता हूँ शौक पूरे आपने,
ध्यान इसका रखता हूँ,
कोई परेशान न हो मेरे अकेलेपन से,
बस यही समस्या समाज की है,
कोई खुद में खुश क्यों है ?
हमने जो रास्ता चुना,
तुम उस से अलग क्यों है ?