मंजिल…

मंजिल अगर ख़ूबसूरत हो तो !!

पर्वत चढ़ने की पगडंडी बनती है,
खाई पार करने के लिए सेतु बनाती है,
उफनती दरिया में तैरने का साहस देती है,
आसमान में उड़ने के लिए पंख लगाती है,

रास्ते के काँटों को फूल में तब्दील करती है,
रिस्ते घावों को गर्व की लाली बनाती है,
गिरे हुए मनोबल को सहारा देती है,
उजाड़ दिख रहे भविष्य को ऊर्वरक देती है,

कड़वे वचनो को फूल की बौछार बनाती है,
उपहास की चोट पर मरहम लगाती है,
नीचा दिखाती हुई नज़रों में ऊपर उठाती है,
निराशा के अँधेरे की मशाल बनती है,

मुसीबतों का मुस्कुरा कर स्वागत करती है,
मुश्किल परिस्थितयों से जूझने का अदम्य साहस् देती है,
आईना बनाकर खुद से रूबरू कराती है,
बासी परतों को छिल कर व्यक्तित्व को निखारती है,

मंज़िल अगर ख़ूबसूरत हो तो क्या क्या करती है ||

जब गलती पकड़ी गई

सुबह से शाम हो गई,
बेचैनी की इंतहा हो गई,

आखिर वो पल आया,
मैंने खुद को कटघरे में पाया,

नज़रों के नौकिले बाण चले,
आत्मसम्मान को छन्नी कर गए,

एक मठरी खाने का ऐसा संताप हुआ,
कांच के घाव से ज़्यादा दर्द हुआ,

आचार की बरनी की टूटने की आवाज़,
कर गई थी मुसीबतों का आगाज़,

बिल्ली पर इल्ज़ाम लगा भी देता,
पर मेरे रिस्ते रक्त का क्या जवाब देता,

अब जब गलती पकड़ी ही गई,
प्रण लेता हो गुनाह न बनेगी,

क्योंकि दूसरी गलती गुनाहगार बनती है,
पर तभी जब वो पकड़ी जाती है !

अंधेरे की रोशनी

रात के अँधेरे में,
रोशनी एक जाग उठती,
मन के भीतर की,
भावनाएँ उज्जवल होती,
करती वो मुझ से बातें,
दिल को जो सुकून देती,
रात के अँधेरे में,
रोशनी एक जाग उठती,

दिन भर के अवलोकन का,
कलरव वो मुझसे करती,
मस्तिष्क के तारो का,
तनाव वो दूर करती,
नई ऊर्जा का,
शरीर में संचार वो करती,
रात के अँधेरे में,
रोशनी एक जाग उठती,

भावनाएँ अपना आँचल फैला,
मुझे आगोश में समेट लेती,
अमन की लोरी सुना,
मुझे नींद में धकेल देती,
प्रकाश जो मन में जला,
उसे संजो के रखती,
रात के अँधेरे में,
रोशनी एक जाग उठती,

उठेंगे जब सुबह,
चेहरे पर मुस्कान होगी,
मन की रोशनी,
व्यक्तित्व की प्रभा होगी,
नये दिन के नयी चुनोतियाँ,
अब बहुत छोटी लगेगी,
वो अँधेरे की रोशनी,
दिन में मन की मशाल बनेगी,