
घने कोहरे को भेदते हुए
मीठी सी धूप झाँकती है
इस चिलचिलाती ठंड में
कुछ मीठा खाने की दरकार होती है
तभी सब्ज़ी के ठेले पर
पालक, मेथी, बथुआ के हरे पत्तो के बीच
लाल गाजर जब दिखती है
तो मन में बस हलवे की ही तस्वीर बनती है
पर गाजर से हलवे तक का सफ़र आसान नहीं होता
मम्मी सबको काम पर लगा देती है
पहले मैं और भैया गाजर धोकर साफ़ करते है
फिर सब ladies मिलकर उसकी छीलती है
और gents उसको घिस कर लच्छे बनाते है
चारो तरफ़ लालिमा छा जाती है
जैसे ये दूब गेरुआ हो चली हो
हम तो इतने में ही थक जाते है
पर अभी तो मेन काम बाकी रहता है
वो लच्छा पता नहीं कितनी देर तक पकता है
कभी दूध, फिर मावा या milkmaid,
मेवा, मीठा,
फिर भुनाई,
जो घंटों तक चलती है
फिर मम्मी ऐसे भुनती है
जैसे मेरी और भैया की पिटाई कर रही हो
भून भून कर वो light red से dark red हो जाता है
(Lipstick लगाने वाले तो समझ ही गए होंगे)
मुझे तो दया ही आ जाती है
बेचारी गाजर के साथ क्या हो गया…
इतनी जद्दोजहद के बाद
सुबह से शाम होने के बाद
इतने लोगो के कड़े परिश्रम के बाद
मम्मी के cervical के pain के बाद
जब वो हलवा तश्तरी में सजा आता है
जिस पर मोती की तरह काजू बिखरे पड़े होते है
जीव्हालोलुप हो आँखें उसे चारो तरफ़ से घूरती है
और उसके एक कौर के जिह्वा से मिलन होने पर
जो तृप्ति इस मन को मिलती है
वो अतुलनीय, अविस्मरणीय, अप्रत्याशित, अभूतपूर्व है
दिव्य है !
जैसे देवो ने धरती पर उतर कर
ख़ुद कढ़ाई चला के परोसा दिया हो !
