
आहिस्ते आहिस्ते थी कदमताल
धड़काने तेज थी
झुकी हुई थी पलके
उस बड़े से दरवाज़े से निकलते हुए
जिसके दोनों तरफ़ ११ मीनारे है
जो बताता है की २२ साल में ये इमारत बनी
ऐसा मुझे guide ने बताया
मन उत्सुक था
पर गाइड के कहने पर
Stage के curtain की तरह
मैंने पलके धीरे धीरे उठाई
तो ये आँखे निहाल हुई
देखकर मोहब्बत के मुजस्समें को
ऐसा लगा
साँसे थम सी गई
और समय ठहर सा गया हो
वो खूबसूरती बहुत ज़्यादा थी
इन छोटी छोटी आँखों के लिए
सफेद संगमरमर की
इस हसीन कलाकृति को
एक साथ समेटने के लिए
यकीन नहीं हुआ कुछ देर तो
की कैसे है ये इतना बेमिसाल
तारीफ़े और शब्द जो सुने थे
वो कम लगे
उस मंज़र को बयान करने के लिए
सफ़ेद चबूतरे पर वो ऐसे रखा था
जैसे ऊपर से कोई सहेज गया हो
इंसान कैसे कर सकता है ऐसी कल्पना
ख्वाबो में भी देखना नमुमकिन सा लगे
पता नहीं
उस पर चढ़ कर क्या ही मिल रहा है इंसान को
मैं तो उसकी पहली झलक से ही उबर नहीं पा रहा हूँ
सुना है
वो हर पहर में रंग बदलता है अपने
क्या ही
क़हर ढाता होगा वो अपने हर रूप में
जब पूर्णिमा की चाँदनी उस पर पड़ती होगी
न जाने कितना चमकता होगा
चुँधिया जाती हो आँखे
कैसे कोई ख़ुद को संभालता होगा
मैं तो बस उसे सूरज की रोशनी में देख पाया
सुबह वाली खिलती हुई मीठी धूप में
जैसे वो धूप से आलिंगन कर रहा हो
या दिन की तेज वाली
जिसमे वो धूप के साथ मुक़ाबला कर रहा हो
की कौन ज़्यादा चमकेगा
और शाम की ढलती हुई
की धूप थक कर जा रही हो
ये कहते हुए
कि कल तुझे हरा दूँगी
मैंने उसे नदी पार कर
महताब बाग की तरफ़ से भी देखा
की कहा से ज़्यादा ख़ूबसूरत दिखता है
पर जहाँ से भी देखू
उसकी ख़ूबसूरती नया रूप ले लेती है
जैसे miss world हो
जो हर costume में फबती है
अविश्वसनीय, अविस्मरणीय, अद्भुत है ये ताज महल
मुझे अब UNESCO पर विश्वास होने लगा है
की उसने इसको अजूबा सही बनाया
ये सारी organisation ग़लत नहीं