वो chocolate का wrapper…

एक chocolate का wrapper फाड़ा था मैंने

किया उसको आधा ,
मन में था की मिले उसको ज़्यादा
वो कुछ आड़ा-टेढ़ा हुआ
टूटा हुआ एक हिस्सा मैंने offer किया

ठुकरा दिया उसे बड़ी बेरहमी से
बिना देखे , बिना जाने
भला क्या गुस्ताखी की थी उसने

नाराज़गी जो थी मुझसे
गाज़ गिरी chocolate के उस टुकड़े पे

तरस आया उस silky-smooth chocolate पर
की काश ये मैंने न दी होती
तो ये अपने अंजाम तक पहुँच गई होती
मुंह में लार की उफनी हुई लहरो में समा कर
ज़ुबान को अपनी मादकता में मदहोश कर
भेजती तार दिमाग़ की उन नसों को
रोज़मर्रा की कश्मकश में मशगूल थे जो
की जरा ठहरो दो पल के लिए
ये अनमोल स्वाद सहेज लो अनंत तक के लिए

पर ऐसा कुछ होने से पहले ही
वो wrapper फटा रह गया
वो chocolate का टुकड़ा धरा का धरा रह गया

तरस आता है उस chocolate पर
की किसी और के हाथ में होती
तो इतनी बेइज़्जत न सहती

दिल का क्या है
उसे तो ठोकरों की आदत है
पर चॉकलेट के साथ ये नहीं होना चाहिए था

वो टूटे हुए हिस्से
पड़े रहें उस फटे हुए wrapper में
रखा रह है गया जो किसी bag में
वो दोनों हिस्से
अपनी अपनी जगह पिघल गए
wrapper से बाहर भी निकले
पर न कभी जुड़ पाए न जुदा हो पाये

शायद रही होगी उसकी भी कोई मज़बूरी
वरना कौन बनाता है chocolate से दुरी
पर एक बार दिल की बात तो साझा करती
मुझे लायकी साबित करने का मौका तो देती
बिना चखे तो chocolate का स्वाद भी नहीं समझाता
ये तो इश्क है जनाब
खाली लिफाफा देख, दिल थोड़े है धड़कता

अगर वो wrapper कभी फटता ही नहीं
ये दिल कभी ऐसे किसी के लिए धड़कता ही नहीं
पड़ी रहती वो chocolate उस wrapper में ही
इसके टुकड़े भी न होते कभी
अब टूटे हिस्सो को कैसे जोड़े
अब chocolate दोबारा कैसे खाये
दिख भी जाती है इश्तेहार में कहीं
उभर आती है तस्वीर उस wrapper की फटी हुई

काश वो chocolate कभीं ख़रीदी न होती
काश वो ज़िन्दगी में आई भी न होती
ख़ुश था मै बिना जाने की chocolate है
ख़ुश था मैं बिना जाने की इश्क़ जैसा कोई एहसास भी है

वो chocolate का wrapper आख़िर क्यों फाड़ा था मैंने

समोसे का दंभ

इठलाता हुआ
एक तरफ़ हरी
तो दूजी और लाल चटनी
लिए चलता है समोसा

उसे गुरूर है
की मुझे कौन हटा सकता है
सरकारी दफ़्तरो को मीटिंग
Evening snacks
बच्चों की birthday party
या सुबह के नाश्ते से
चाहे रिश्ता पक्का करना हो
या cocktail party
मैं तो हर तरफ़ हूँ
मेरे नाम पर तो kitty party भी चलती है – समोसा किटी

तभी तो नौक निकल कर
अपने किनारे पैने करके रहता है
मौके के हिसाब से छोटा बड़ा हो जाता है
जगह और season के हिसाब से ख़ुद को एडजस्ट भी कर लेता है
आलू तो है ही
सर्दियो में गोभी या मटर
Lavish करना हो तो काजू किशमिश या पनीर
या south में जाओ तो राइ करिपटा
और तो और non-veg में कीमा का भी बन जाता है
health conscious लोगो के लिए
Baked समोसा भी आने लगा है
इस versatility को कौन टक्कर दे पाएगा

हुए थे कुछ खड़े
जैसे की
ढोकला – खाते हुए तो पानी गिरने लगता है
Patties – आधी पापड़ी बिखरी पड़ी रहती है,
जैसे किसी छोटे बच्चे ने खाया हो,
शोभा देता इस तरह खाना

कचौड़ी थोड़ी टिक पायी
पर बिना आलू की सब्ज़ी के
वो जल बिन मछली लगती है
पकौड़ी ने भी काफ़ी मशक्कत करी
पर वो अपनी variety में ही उलझ कर रह गए
की आलू का मंगाये या गोभी का या प्याज का या ब्रेड का
अब वड़ा पाव भी आ रहा है टक्कर में
पर जितने में उसका वड़ा बनेगा
उतने में मैं पूरा बन जाऊँगा
और पाव में fit हो जाऊ

विदेश से भी कुछ लोग आए थे competition देने
Burger, sandwich जैसे
तो उनका बन-समोसा
और समोसा-सैंडविच बना दिया 😈

इंसान कुछ भी experiment कर ले
घूम फिर के समोसे में पास ही आ जाता है
इतनी सहूलियत कोई भी नहीं दे पाता न
और इसके साथ अदरक वाली चाय हो जाए
तो स्वाद में चार चाँद लग जाए

पर क्या अजूबा बनाया है ये
तिकोना सा
पूर्वोत्तर में जिसे सिंघाड़ा भी बोलते है
जैसे कोई लाला मुंह फुलाये बैठा हो

गाजर का हलवा

घने कोहरे को भेदते हुए
मीठी सी धूप झाँकती है
इस चिलचिलाती ठंड में
कुछ मीठा खाने की दरकार होती है

तभी सब्ज़ी के ठेले पर
पालक, मेथी, बथुआ के हरे पत्तो के बीच
लाल गाजर जब दिखती है
तो मन में बस हलवे की ही तस्वीर बनती है

पर गाजर से हलवे तक का सफ़र आसान नहीं होता
मम्मी सबको काम पर लगा देती है
पहले मैं और भैया गाजर धोकर साफ़ करते है
फिर सब ladies मिलकर उसकी छीलती है
और gents उसको घिस कर लच्छे बनाते है
चारो तरफ़ लालिमा छा जाती है
जैसे ये दूब गेरुआ हो चली हो

हम तो इतने में ही थक जाते है
पर अभी तो मेन काम बाकी रहता है

वो लच्छा पता नहीं कितनी देर तक पकता है
कभी दूध, फिर मावा या milkmaid,
मेवा, मीठा,
फिर भुनाई,
जो घंटों तक चलती है
फिर मम्मी ऐसे भुनती है
जैसे मेरी और भैया की पिटाई कर रही हो

भून भून कर वो light red से dark red हो जाता है
(Lipstick लगाने वाले तो समझ ही गए होंगे)
मुझे तो दया ही आ जाती है
बेचारी गाजर के साथ क्या हो गया…

इतनी जद्दोजहद के बाद
सुबह से शाम होने के बाद
इतने लोगो के कड़े परिश्रम के बाद
मम्मी के cervical के pain के बाद

जब वो हलवा तश्तरी में सजा आता है
जिस पर मोती की तरह काजू बिखरे पड़े होते है
जीव्हालोलुप हो आँखें उसे चारो तरफ़ से घूरती है
और उसके एक कौर के जिह्वा से मिलन होने पर
जो तृप्ति इस मन को मिलती है
वो अतुलनीय, अविस्मरणीय, अप्रत्याशित, अभूतपूर्व है
दिव्य है !
जैसे देवो ने धरती पर उतर कर
ख़ुद कढ़ाई चला के परोसा दिया हो !

Dundee Cake

Almonds gracing it
like beads of necklace.

An orange brown extravaganza
presented itself before us.

Our hungry eyes and
saliva ozing tongues
gazed it inappropriately!

As the triangle shaped piece
rested before me,
I shyingly took one bite
AND WHAT?

It was outbursts of flavours
hunting among themselves
to be recognized at first.

There was cinnamon, lemon,
orange with peels,
nut and raisins and fruits,
soaked in rum.

It was a Christmas party
inside my mouth.

Carols started ringing inside ears
and fragrance came out of my nostrils.

I could relish time
with swirls of my tongue
for every second
before finally gorging it.

The slurpy voices gave away
secret pleasure
which everyone was having
while hogging over the
“Dundee Cake”.

नादान सा भटूरा

आज कल दफ्तर में Healthy living का प्रचलन हो चला है,
Sprouts, oats, ragi, soya, न जाने कौन कौनसे खाने चल पड़े है,
दादी कहती है ये सब तो हमारे जमाने में गाय भैंसे खाया करती थी,
इस फिटनेस की स्पर्धा से बेफिक्र, एक मनचले ने छोले भटूरे ऑर्डर कर दिए,

लंच में सब टेबल के चारो साथ बैठे और अपने नीरस से टिफिन को देख हताश हो गए,
अब टेबल के बीचोबीच रखे उस नादान भटूरे पर सबकी टकटकी थी,
जिसके एक तरफ छोले महक रहें थे और दूसरी और आचारी प्याज,
जिसको उस मनचले ने सबको ऑफर किया,
एक असमंजस की स्थिति आ गई की
अपने ऊपर थोपे हुए इस waist size और वजन के टारगेट को चुने या
जो लार की सुनामी मुंह में आन पड़ी और जिव्हा के बांध में रुकी हुई है उसकी सुने

आखिर सारे बंधन तोड़ मैने अपना हाथ बढ़ाया
तो किसी ने AK-47 जैसा ताना मारा,
“अरे क्या हुआ तुम्हारी फिटनेस गोल का”
हमने कहा कुछ न होगा एक bite से,
और अपने अंतर्द्वंद को विराम दिया,
हमारे पीछे वो तानेवाला भी लपका एक bite को,
तो हमने AK-56 से ताना मारा,
“क्यों भाई, तुम भी,
तो बोला एक bite से तुम्हारा नहीं कुछ होगा तो मेरा क्या होगा

इसी शर्म और कश्मकश के शिकार सब है,
पर भटूरे की तलब हर तरफ है,
क्या गलती उस नादान से गुलगुल भटूरे की,
जो मुंह फुलाए बैठा है,
अपने संग छोले की टोली लेकर ऐंठा है,
की कब तक करोगे deiting,
बहुत हो गई acting,
तुम से न हो पाएगा
हर पल तरसाऊंगा
फिर मुझे छुप कर खाओगे
और पुराने बहाने बनाओंगे
समझ जायेंगे घरवाले
क्योंकि वो भी खाएं है !