आज जब धूप की चोंध से आंख खुली,
घर फैला देख सुकून की अनुभूती हुई,
कोई चीज़ ढूंढने की ज़रूरत नही थी,
सब बाहर ही बिखरी पड़ी थी,
शांति के सुरूर में खोया हुआ,
सप्ताहांत आनंदमय रहा,
तभी पिताजी का फोन आया,
हमने तरन्नुम में कॉल उठाया,
उन्होंने अपने आने की सूचना दी,
तूफान से पहले की शांति भंग हुई,
दीवार पर भागती छिपकली को देखा,
आने वाले चक्रवात का हुआ अंदेशा,
मकड़ियों से माफी मांगनी पड़ी,
जब उनके जालो पर झाड़ू रूपी बुलडोज़र चलाई,
किचन में भी खूब कोलाहल मचाया,
काफी चीज़ों को खाद में बदला पाया,
बाथरूम, बेसिन, चादर सब धो डाला,
साफ घर मुझको भी रास आया,
आखिर माता पिताजी पधारे,
खुशी में हमने व्यंजन पका डाले,
उनके पैमानों पर घर खरा न उतरा,
हमारी मेहनत पर पानी फिर गया,
सब जन्तुओ का बलिदान व्यर्थ गया,
जब सुदूर कोनो में भी मैल ढूंढा गया,
पंखे को लेकर बहूत बवाल हुआ,
वो भी साफ होता है ये तभी ज्ञात हुआ,
माँ के पकवान और पिता के प्रवचन में,
न जाने कब दस दिन निकल गए,
आखिर उनके जाने की बेला आयी,
छुपा हुआ सामान निकाल कर आज़ादी मनायी,
ये स्वतंत्रता ने भी गजब ढहा,
जब माता पिता सास ससुर,
और गृहनगर ससुराल लगने लगा ।