मर्दानगी

मर्द को दर्द नही होता,
क्योंकि वो अपना दर्द,
औरत पर निकाल देता है,
डांट कर, मार कर, रुला कर,
आवाज़ दबा कर, भूला कर,
ज़बरदस्ती कर, छोड़ कर,
चाहे वो पत्नी हो, बेटी हो,
बहन हो, माँ हो, रिश्ते में हो,
या कोई अनजान ही हो,

किसी लड़की ने ठुकरा दिया,
महिला बॉस ने कुछ बोल दिया,
बीवी ज़्यादा कमाने लग गयीं,
या बाजार में ही किसी ने
दो टूक शब्दो में आईना दिखा दिया,
तो मर्दानगी के गुब्बारे में
पिन चुभ जाता है,
अहंकार को ठेस पहूँचती है,
इतनी की वो अच्छाई भूल जाता है,
बस मर्दानगी को ध्यान रखता है,
घृणा में अंधा होने लगता है,
क्रोध में आगबाबुल हो जाता है,
जघन्य अपराध तक कर बैठता है,

पर ये कुछ नही,
मर्द तो हर चीज़ का गुस्सा औरत पर उतरते है,
दफ्तर का, अपनी विफलता का,
बच्चो का, रिश्तेदारों का,
जैसे वो एक थैला हो,
अपनी कमज़ोरियां छुपाने का,
अपने दंभ को बल देने का,

समझ नही आता ये कैसी मर्दानगी है,
ये कैसा पौरुष है,

दोस्त की इल्तजा

मेरे दोस्त ने मुझसे पूछा-
“नाम तो बता उस खुशनसीब का ।
रहती है जो तेरे दिल में और
साहील है तेरी कविता का ।”

जवाब मेरा कुछ यूं निकला-
“इस गुमनाम मोहब्बत को तू नाम न दे ।
भावना के बवंडर को हाशिये पर ही रहने दे ।
मत आज़मा मेरे सब्र का बांध।
तिनका तिनका हो जाएगा मेरा गुमान।
बहुत सुकून है इस झूठे दिलासे में ।
की ख़ुशी मिलती है उसकी मुस्कराहट से ।
ऐ अज़ीज़ गुस्ताखी माफ़ कर दे ।
बेहतर होगा की ये इल्तिजा अधूरी रहे ।”

चाँद और नाखून

कभी कभी चाँद को देखता हूँ
तो आधा चाँद 
टूटे हुए नाखून का 
रूप अख्तियार कर लेता है,

जब दिल टुटता है,
तो दिल का एक हिस्सा अलग हो जाता है,
वो शायद टूटे नाखून जैसा होगा,
तारा तो नही बनता वो,
चाँद के रूप में याद आता है,

नाखून फिर उग आते है,
पर दिल का घांव नही भरता,

अठलेखियां

पथरीले तट से दूर तक,
सिर्फ हरा-नीला पानी बिखरा है,
हवा और पानी आपस में खेल रहे है,
हवा पानी को पत्थरो की तरफ धकेलता है,
पानी पत्थरो को छूकर पीछे भाग जाता है,
जैसे उन नादान बेजान पत्थरो से डरता हो,
ये हवा-पानी-पत्थरो की अठलेखियां,
आँखों और कानो को सुकून देती है,
पत्थरों से पानी की टकराने की आवाज़ में मासुमियत है,
जो मन को बचपन की यादों में ले जाती है,
कितना साफ़ मन हुआ करता था हमारा,
यहाँ पानी और पत्थरों में जो प्रदुषण है,
वो मनुष्य द्वारा ही फैलाई हुई है,
जैसे हमारे मन को संसार की सच्चाई,
संशय और संदेह से मलिन कर रही है,

माँ की याद

घर से दूर, 
इस परदेस में,
माँ याद बहुत आती है,
हर पल आती है,
रोज़ के कामो में,
कपडे संवारते हुए,
घरेलु सामग्री खरीदते हुए,
भोजन करते हुए तो कभी-कभी गला रुन्ध्या जाता है,

पर माँ अक्सर बहुत अलग तरीको से भी याद आती है,
जैसे टिफिन के बासी पराठे खाते हुए,
दूध से मलाई उतारते हुए,
सुबह को बादाम भीगे न मिलने पर,
कपडे प्रेस करने पर,
खिड़कियों पर जमी धूल देख कर,
खाने में हरी चटनी की कमी होने पर,
ऑफिस में किसी छोटे बच्चे को देख कर,
साडी दुकान का बोर्ड देख कर,
कही महिला संगीत की बात सुन कर,

घर में पानी न आने पर,
(क्योंकि माँ हमेशा पानी भर के रखती है)
कही जाने के लिए पैकिंग करने पर,
(उनके सुझाव याद आते है)
आइसक्रीम खाने पर, खासकर कुल्फी,
(क्योंकि उन्हें बहुत पसंद है)
नींद न आये तो माँ की गोद,
(क्योंकि वो सर पर हाथ फेरकर सुलाती है)

बीमारी में खिचड़ी बनाते हुए,
गर्मी में तरबूज़ खाते हुए,
सर्दी में सूप पीते हुए,
और बारिश में पकोड़ों के लिए तरसते हुए,

कपडे तार से उतारते हुए,
गंदे तौलिये से हाथ पूछते हुए,
सुबह उठ कर बिस्तर संवारते हुए,
गन्दा रुमाल जेब में रखते हुए,
छुट्टी के दिन देर से नहाते हुए,
(क्योंकि इन सब के लिए बहुत डांट पड़ी है),

और आज Mother’s Day है,
आज तो भरपूर याद आएंगी ।

बरसात की रात

ये बरसात की रात,
धरती के सीने पर पड़ती,
पानी की बूंदों की आवाज़,
बादल की गड़गड़ाहट,
आसमान से चलते बिजली के तीर,
खिड़की पर खड़ी एक शर्माती लड़की,
कॉफ़ी ले कर आता हुआ एक नौजवान,
इश्क़ की भोर में कसमसाते दो दिल,
घड़ी की सुई से सुर मिलती धड़कन,
खामोशी का आलम,
कॉफ़ी का घुट भरते हुए उनके थिरकते होंठ,
अंधेरे में झांकती चार आंखें,
मन मे दौड़ते हुए ख्याल,
नौजवान हिम्मत जुटा कर पूछता है
“कॉफी कैसी बनी”
लड़की हल्के स्वर में जवाब देती है “अच्छी”
खिडकी के किनारो पर खड़े होकर,
दोनों चुपचाप कॉफी खत्म करते है,

लड़का अपना हाथ से बारिश के साथ खेलते हुए पूछता है,
लड़का पूछता है “तुमको बारिश अच्छी लगती है”
लड़की कहती है “हाँ” और पूछती “तुमको”
लड़का “नही पर आज अच्छी लग रही है”
लड़की शर्मा के पूछती “क्यों”
लड़का “क्योंकि आज बारिश बातें कर रही है”
लड़की फिर शर्माती और पूछती “कैसे”
लड़का उसकी तरफ इशारा करके बोलता “ऐसे”
बादल घड़घड़ाने लगे तो लड़के ने पूछा
“तुम्हे डर नही लगता इस आवाज़ से”
लड़की बोलती “लगता है पर आज नही लग रहा”
लड़का पूछता “क्यों”
लड़की कहती “शायद तुम साथ हो इसलिए”
दोनों ही मंद मंद हँसने लगते है ।

दोनों के मन में भावनाये उफान पर है,
प्यार अंगड़ाइयां ले रहा है,
कितने दिनों बाद मिलेे है दोनों,
बचपन मे घर-घर खेलते थे,
और पति – पत्नी बनते थे,
तभी इस चाहत का अंकुर फूटा था,
वक़्त के थपेड़ों ने उन्हें दूर तो कर दिया,
पर उस नन्हे बीज को मधुर यादें सींचती रही,
इसलिए इतना समय बीतने के बाद भी लगता है,
जैसे कल ही का वाक्या हो,
इस मासूम सी प्रेम कहानी की टोह,
उनके घरवालों को थी,
तभी तो दोनों का रिश्ता जोड़ने को मिले है आज,
उस अधूरी कहानी को पूरी करने,
और पुरानी दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलने |

पुचका

पताशे को फूटते हुए,
मसाला भरते हुए,
फिर पानी मे डुबकी लगाते हुए,
मेरी उम्मीद भारी आंखें जब देखती है,
तो पेट से एक आवाज़ आती है,

पताशे को फूटते हुए,
मसाला भरते हुए,
फिर पानी मे डुबकी लगाते हुए,
मेरी उम्मीद भारी आंखें जब देखती है,
तो पेट से एक आवाज़ आती है,

लार टपकने ही वाली होती है ,
की घप से पुचके को मुँह में भर लेते है,
जिह्वा और तालु के बीच,
जब वो अपनी छटा बिखेरता है,
खट्टा, मीठा, तीखा, कुरकुरा,
सब स्वाद मिलकर एक झटका देते है,
शरीर मे सिहरन उठती है,
जैसे चिर सत्य यही है,
धीरे धीरे जब वो घुलने लगता है,
चरम सुख का अनुभव,
जैसे भाव उत्पन्न होते है,

फिर एक और खाने की तलब लगती है,
फिर बार बार खाने की इच्छा करती है,
गोल गप्पे बस एक व्यंजन नही,
भावनाओ का हुजूम है ।

शहर

आओ आज एक शहर कि सांसे गिनते है,

चिड़िया की चहक के बीच जब एक शहर जागता है,
पो फटते ही साइकल पर अखबार वाले,
घर घर खबरों का विस्फोट करने निकल पड़ते है ।

धुँधली रोशनी में ताज़ी हवा का लुत्फ उठाने और 
हार्ट की बीमारियों से निजात पाने का बहाना बनाकर,
अनगिनत मुद्दों पर चर्चा करते हुए लोग टहलते नज़र आते है ।

कही कही शतरंजी पर योग के कोंण बनते,
निराशा भरे जीवन मे ज़बरदस्ती हंसी के ठहके लगते,
कुछ कुछ भटके हुए युवा भी नज़र आ जाते है,
दौड़ लगते हुए या जिम जाते हुए ।

शहर के कोने कोने से छोटी नदियों की तरह,
यूनिफार्म में सजे बच्चे निकलते है,
और स्कूल रूपी समंदर में विलीन हो जाते है

ताज़ा फल-सब्ज़ी को सजाए,
फेरी वाले सुर से सुर मिलाए,
ग्राहकों को लुभाने की कोशिश करते है

नाश्ते की रेडियों पर लोग चाय की चुस्कियों के साथ
वड़े पोहे का रसास्वादन होता है

और  पटरी के किनारे बैठ कर,
लोग प्रकृति को दैनिक भेंट प्रेषित करते है

अब सूरज ऊपर चढ़ते लगा है,
अब निद्रा देवी के लाल जाग कर,
इच्छा के विपरीत बिस्तर त्याग कर,
पल भर में अपनी दिनचर्या पूरी करके,
सड़को पर लगी वाहनों की लंबी कतार में जुड़ जाते है

दिन भर की जद्दोजहद,
उठापठक उथल पुथल के बीच,
सूरज की चुभती किरणों के नीचे,
इंजन की तेज आवाज में हॉर्न के तड़के में बधिर,
धुंए धूल के गुबार में गायब,हँसने-रोने, लड़ाई-झगड़े, ऊँचे-नीचे स्वरों के इंद्रधनुष में,
ज़िम्मेदारियों गतिविधियों को अंजाम देते है,
हर इंसान जीवन की दौड़ में सुध बुध खोया नज़र आता है

सूरज ढलते ही उन्ही सड़क रूपी जीवन रेखाओ से होकर,
योद्धा वापस अपने अपने आशियाने पहुंचते है,
और शर्बत के साथ राहत की सांस भरते है,
अब शाम जवान होने लगी है,
ट्यूशन के बाहर दोस्त हंसी के चटखारे,
कॉफी आइसक्रीम के बहाने आशिकी,
रेस्तरां में परिवार साथ समय बिताने की कोशिश,
और मयखानों में ऊंची ऊंची कथनी,शाम की नब्ज बताती है

दुकानो पर शटर गिरते ही शहर वीराना हो जाता है,
उनके सामने कुकुर अपनी सेज सजा लेते है,
चौकीदार की सीटियों के अलावा,
अब सिर्फ कुछ तीव्र खर्राटे ही सुनाई पड़ रहे है

शहर वाले सो गए है,
पर शहर अभी भी कही जगा है,
अस्पताल के एमरजेंसी वार्ड में,
रेलवे स्टेशन पर इंतज़ार करते मुसाफिरों में,
मोबाइल पर गुपचुप मिलते दिलो में,
भविष्य बनाते छात्रों की किताबो में ।

ये शहर में रोज़ना बहूत कुछ होता है,
पर कुछ पहलू अनकहे ही रहे तो बेहतर है ।