आओ आज एक शहर कि सांसे गिनते है,
चिड़िया की चहक के बीच जब एक शहर जागता है,
पो फटते ही साइकल पर अखबार वाले,
घर घर खबरों का विस्फोट करने निकल पड़ते है ।
धुँधली रोशनी में ताज़ी हवा का लुत्फ उठाने और
हार्ट की बीमारियों से निजात पाने का बहाना बनाकर,
अनगिनत मुद्दों पर चर्चा करते हुए लोग टहलते नज़र आते है ।
कही कही शतरंजी पर योग के कोंण बनते,
निराशा भरे जीवन मे ज़बरदस्ती हंसी के ठहके लगते,
कुछ कुछ भटके हुए युवा भी नज़र आ जाते है,
दौड़ लगते हुए या जिम जाते हुए ।
शहर के कोने कोने से छोटी नदियों की तरह,
यूनिफार्म में सजे बच्चे निकलते है,
और स्कूल रूपी समंदर में विलीन हो जाते है
ताज़ा फल-सब्ज़ी को सजाए,
फेरी वाले सुर से सुर मिलाए,
ग्राहकों को लुभाने की कोशिश करते है
नाश्ते की रेडियों पर लोग चाय की चुस्कियों के साथ
वड़े पोहे का रसास्वादन होता है
और पटरी के किनारे बैठ कर,
लोग प्रकृति को दैनिक भेंट प्रेषित करते है
अब सूरज ऊपर चढ़ते लगा है,
अब निद्रा देवी के लाल जाग कर,
इच्छा के विपरीत बिस्तर त्याग कर,
पल भर में अपनी दिनचर्या पूरी करके,
सड़को पर लगी वाहनों की लंबी कतार में जुड़ जाते है
दिन भर की जद्दोजहद,
उठापठक उथल पुथल के बीच,
सूरज की चुभती किरणों के नीचे,
इंजन की तेज आवाज में हॉर्न के तड़के में बधिर,
धुंए धूल के गुबार में गायब,हँसने-रोने, लड़ाई-झगड़े, ऊँचे-नीचे स्वरों के इंद्रधनुष में,
ज़िम्मेदारियों गतिविधियों को अंजाम देते है,
हर इंसान जीवन की दौड़ में सुध बुध खोया नज़र आता है
सूरज ढलते ही उन्ही सड़क रूपी जीवन रेखाओ से होकर,
योद्धा वापस अपने अपने आशियाने पहुंचते है,
और शर्बत के साथ राहत की सांस भरते है,
अब शाम जवान होने लगी है,
ट्यूशन के बाहर दोस्त हंसी के चटखारे,
कॉफी आइसक्रीम के बहाने आशिकी,
रेस्तरां में परिवार साथ समय बिताने की कोशिश,
और मयखानों में ऊंची ऊंची कथनी,शाम की नब्ज बताती है
दुकानो पर शटर गिरते ही शहर वीराना हो जाता है,
उनके सामने कुकुर अपनी सेज सजा लेते है,
चौकीदार की सीटियों के अलावा,
अब सिर्फ कुछ तीव्र खर्राटे ही सुनाई पड़ रहे है
शहर वाले सो गए है,
पर शहर अभी भी कही जगा है,
अस्पताल के एमरजेंसी वार्ड में,
रेलवे स्टेशन पर इंतज़ार करते मुसाफिरों में,
मोबाइल पर गुपचुप मिलते दिलो में,
भविष्य बनाते छात्रों की किताबो में ।
ये शहर में रोज़ना बहूत कुछ होता है,
पर कुछ पहलू अनकहे ही रहे तो बेहतर है ।