
कवि की कल्पना


न हम थे तुम्हारे बिन
न तुम थे हमारे बिन
मिले है हम तुम
तो मिल गया है हमदम
न भी रहे हम या तुम
सदा रहेगा हमदम
गुजर जाने दो इन पलों को
इन पलों का क्या है
हमारी हस्ती तो इतिहास के पटल पर
इन पलों की खरोचों से बनी है



इश्क में हूँ मैं मेरे खुदा ।
मेरी गलतियों को नकार दो ।।
अपनों से रहने लगा हूँ जुदा ।
इस दिल के मर्ज़ का इलाज़ करो ।।
ये अफसाना न बन जाए दास्ताँ ।
इस मोहब्बत को मुकाम दो ।।
मेरी ज़िन्दगी का है अब यही फ़लसफ़ा ।
मुझ पर एक बार तो ऐतबार करो ।।
कद्र न की इस ज़ालिम ज़माने ने ।
दर्द-ऐ-दिल मिटाने गया जब मयखाने में ।
हाल ये हो गया है इस बेकद्री का ।
हाल हो ये गया है इस बेकद्री का ।।
जब जब दिल से निकलती है आह !
लोग कहते है वाह वाह वाह वाह !!
हार से ऐसी दोस्ती हो गई है,
हर मोड़ पर टकरा जाती है,
शायद किसी दिन मज़ाक करे ,
और जीत से मुलाकात करा दे !