Up in the air

Struggling its way,
Through mystique of fog & storm,
Aircraft enters to,
A world of floating clouds,

Looking like Snow Clad Mountains,
The kid in me wants to hop on it,
Make castles of whiteness,
Or The Froth of Milk,
Floating & ignoring gravity,

Or The Foam of Water,
When sea hits the shore,

Or The Frozen Bubbles ,
Like they have jammed,

Or Livening the Color of White,
Forming sculptures,

Or Giving Heart to Cotton,
Where height of mounds,
Tells intensity of emotion,

Or Fields of Salt,
Taking liberty,
And making art,

Or A gift of sweetness,
By spreading sugar all over,

Or Innovation of Chef,
Icing a White Forest Cake,

Or Vivid fields spread with Snow,
Carefree scattered whiteness,

Or Burst balloon,
But obstructed in motion,

Or Bubbles of ice,

Or Frozen smoke,

In distance i could envision,
A place for my fairy tale,
My muse sitting on a mound,
Floating on the white field,

Horizon has never looked so beautiful,
My geography text book comes alive,
How more beautiful can himalyas look,

The scenery resembles purity,
Nature propagating its originality,
Trying to cover the darkness below,

But the view of earth peeks,
It seems to realise humans its mistake,
How the super beings,
(supposed to take care)
Are insensitively destroying their mother,

Torrid rain are the anger,
And acid rain is her pain,
Throwing back the dirt,

Through clouds it says :
‘Enough is enough’
At least let me live here in peace.

As the fairy world departs,
And reality comes alive,
Feels like waking up from a dream,
A dream seen with open eyes,

रोमांस की रोटी

यूं तो आटा और पानी दूर दूर रखा जाता है,
की कही आटा गिला न हो जाये
और कंगाली ले आये,
मतलब लड़का लड़की,
किसी गलत संगत में न् पड़ जाए,

पर जब पेट मे चूहें उधम मचाते है,
या प्यार का कीडा ‘lovebug’ काटता है,
फिर पानी आटे में धीरे धीरे मिलता,
लड़की को धीरे धीरे रिझाना पड़ता है,
इतनी आसानी से कहा मानती है भाइयो !
स्वाद के लिए नमक भी बुरका जाता है,
इन्हें माशूका के नखरे समझ लीजिये,
उसे गुथा जाता है,
जैसे प्यार की कशमकश, नोक झोंक है,
उसे बेलन से बेला जाता है,
मतलब अब प्यार परवान चढ़ने लगा है,
भले ही शादी के बाद बेलन का उपयोग बदल जाये,
पहले रोटियां गोल नही होती,
मोहब्बत में उतार चढ़ाव होते है,
इसलिए थोड़ा आटे का पलोथन भी लगाते है,
यानी कि तारीफ के पुल बंधकर, झूठे या सच्चे,
धीरे धीरे रोटी और प्यार को आकर देते है,
पलट पलट कर गरम तवे पर सेंका जाता है,
क्योंकि इश्क़ की तपिश दोनों तरफ बराबर है,
वो फूलती है,
यानी दोनों ही ख़ुशी में फुले नही समा रहे,

भले ही ये कविता कम,
और रोटी की विधि ज़्यादा लग रही है,
पर रोटी बनाने का एक एक कदम,
प्यार की recipe है,

सफर…

उस कत्रिम दूधिया रोशनी तले,
आंखों के तारे टिमटिमाते हुए,
मैं जाती हूँ रोज़ एक अनचाहे सफर पे,

घबराहट शुरू हो जाती है,
दरवाज़े के सामने भीड़ देख कर,
मां की बात याद आती है,
स्पर्श का भेद पहचानने पर,
सिहर उठता है बदन सोच-सोच कर,

मानव गुत्थी का जाल भेद,
प्रवेश करती हूँ चक्रव्यूह में,
तीखी चुभती नज़रो का वेग,
ला देता है सुनामी अंतर्मन में,

रंगी होती अगर पुरुष की हथेली,
जाहिर हो जाती बिभत्सता की होली,
मुझे भी नही मालूम इस व्यूह का तोड़,
खोल देता है जो आत्मविश्वास के जोड़

आश्रय देती ममता की छांव,
आंखों से रिस्ते है अंदरूनी घाव,
समझाती है तब एक महिला मुझे,
देता है हर ज़ख्म बल हमे,
ऐसे ही नही होती नारी श्रेष्ठ ।

Running – A musical !

As the sole below my feet,
Hits the ground,
The knocking sound,
Reverberates in my ear,
It synchronises,
With my heartbeat,
Which is loud enough,
Even for passerbys,

My puffed up breath,
Looks for outing through larynx,
I seam my lips,
And expand my nostrils,
To accomodate the extra air,
Going in & out,
It finds rhythm with the symphony,
And become lead voice of my body.

The hands & legs adjust,
To the tune set by,
Breath, feets & heart beats.
The body is now,
“A Musical”

Instigating rains,
From the pores of skin,
Sweat oozing out,
From places of my body,
I didn’t even know,
The droplets stranded,
On the edges of hairs,
Like morning dew on petal,
However its no petrichor,
But aroma of satisfaction,
Engulfing my aura.

दुल्हन

गहरी सोच में डूबा था मेरा मन,
कानो में पड़ी पायल की खन खन,

उत्सुक होकर मैंने आवाज़ का पीछा किया,
और उस नज़ारे को देख मैं दंग रह गया,

एक प्यारी सी दुल्हन आ रही थी,
उसकी मुस्कान गज़ब ढा रही थी,

लहंगे ने रंगों का ऐसा उत्सव मनाया,
जरी की चांदनी ने सबका मन भाया,

स्वर्ग की अप्सरा सा था उसका रूप,
मन को मेरे किया उसने अविभूत,

माहौल खुशियों से इस तरह भर गया,
वो पल हमेशा के लिए चित्त में घर कर गया ।।

When I’ll be dead

Your tears will flow,
But I won’t know,
Cry for me now, Instead !

You will send flowers,
But I won’t see,
Send them now, Instead !

You’ll say words of praise,
But I won’t hear,
Praise me now, Instead !

You’ll forget my faults,
But I won’t know,
Forget them now, Instead !

You’ll miss me then,
But I won’t feel,
Miss me now, Instead

You’ll wish,
We could have spent more time,
Spend it now, Instead !!

मंजिल…

मंजिल अगर ख़ूबसूरत हो तो !!

पर्वत चढ़ने की पगडंडी बनती है,
खाई पार करने के लिए सेतु बनाती है,
उफनती दरिया में तैरने का साहस देती है,
आसमान में उड़ने के लिए पंख लगाती है,

रास्ते के काँटों को फूल में तब्दील करती है,
रिस्ते घावों को गर्व की लाली बनाती है,
गिरे हुए मनोबल को सहारा देती है,
उजाड़ दिख रहे भविष्य को ऊर्वरक देती है,

कड़वे वचनो को फूल की बौछार बनाती है,
उपहास की चोट पर मरहम लगाती है,
नीचा दिखाती हुई नज़रों में ऊपर उठाती है,
निराशा के अँधेरे की मशाल बनती है,

मुसीबतों का मुस्कुरा कर स्वागत करती है,
मुश्किल परिस्थितयों से जूझने का अदम्य साहस् देती है,
आईना बनाकर खुद से रूबरू कराती है,
बासी परतों को छिल कर व्यक्तित्व को निखारती है,

मंज़िल अगर ख़ूबसूरत हो तो क्या क्या करती है ||

जब गलती पकड़ी गई

सुबह से शाम हो गई,
बेचैनी की इंतहा हो गई,

आखिर वो पल आया,
मैंने खुद को कटघरे में पाया,

नज़रों के नौकिले बाण चले,
आत्मसम्मान को छन्नी कर गए,

एक मठरी खाने का ऐसा संताप हुआ,
कांच के घाव से ज़्यादा दर्द हुआ,

आचार की बरनी की टूटने की आवाज़,
कर गई थी मुसीबतों का आगाज़,

बिल्ली पर इल्ज़ाम लगा भी देता,
पर मेरे रिस्ते रक्त का क्या जवाब देता,

अब जब गलती पकड़ी ही गई,
प्रण लेता हो गुनाह न बनेगी,

क्योंकि दूसरी गलती गुनाहगार बनती है,
पर तभी जब वो पकड़ी जाती है !

अंधेरे की रोशनी

रात के अँधेरे में,
रोशनी एक जाग उठती,
मन के भीतर की,
भावनाएँ उज्जवल होती,
करती वो मुझ से बातें,
दिल को जो सुकून देती,
रात के अँधेरे में,
रोशनी एक जाग उठती,

दिन भर के अवलोकन का,
कलरव वो मुझसे करती,
मस्तिष्क के तारो का,
तनाव वो दूर करती,
नई ऊर्जा का,
शरीर में संचार वो करती,
रात के अँधेरे में,
रोशनी एक जाग उठती,

भावनाएँ अपना आँचल फैला,
मुझे आगोश में समेट लेती,
अमन की लोरी सुना,
मुझे नींद में धकेल देती,
प्रकाश जो मन में जला,
उसे संजो के रखती,
रात के अँधेरे में,
रोशनी एक जाग उठती,

उठेंगे जब सुबह,
चेहरे पर मुस्कान होगी,
मन की रोशनी,
व्यक्तित्व की प्रभा होगी,
नये दिन के नयी चुनोतियाँ,
अब बहुत छोटी लगेगी,
वो अँधेरे की रोशनी,
दिन में मन की मशाल बनेगी,