बिखरी जब सावन की घटा,
धरती की तृष्णा को तारण मिला,
रोप उठा उसका रोम रोम,
जमा पत्थरो पर भी काई का मोम,
सूरज की किरणे बनी इतिहास,
बून्द के बाणों ने किया जब आगाज़,
भर आई जलाशयों की गोद,
इठलाती नालियों में भी आया लोभ,
आम की डालों पर गिरे झूले,
मोर ने बागों में अपने पंख खोले,
संखियाँ तीज के गीत गुनगुनाने लगी,
रसोई से पतोड़ की खुशबू भिनभिनाने लगी,
सावन की है अद्भुत बेला,
सींचती है चित्त मे नूतनता ।








