सावन की बेला

बिखरी जब सावन की घटा,
धरती की तृष्णा को तारण मिला,

रोप उठा उसका रोम रोम,
जमा पत्थरो पर भी काई का मोम,

सूरज की किरणे बनी इतिहास,
बून्द के बाणों ने किया जब आगाज़,

भर आई जलाशयों की गोद,
इठलाती नालियों में भी आया लोभ,

आम की डालों पर गिरे झूले,
मोर ने बागों में अपने पंख खोले,

संखियाँ तीज के गीत गुनगुनाने लगी,
रसोई से पतोड़ की खुशबू भिनभिनाने लगी,

सावन की है अद्भुत बेला,
सींचती है चित्त मे नूतनता ।

दीवाली की फ़ोटो

दीवाली की सफाई करते हुए,
अलमारी में कपड़ो के बीच,
दबी हुई एक पुरानी तस्वीर,
सामने आई तो,
यादों की रील चल पड़ी,
उस पीली पड़ गयी फोटो ने,
मन में उमंगों की रंगोली सजा दी,

कितने साल हो गए,
सहेलियों से मिले हुए,
स्कूल में हर काम साथ करते थे,
वो मेरा होमवर्क करती तो
मैं उसकी ड्रॉइंग बनाती,
एक दूसरे की चोटी भी करते थे,
उसके टिफिन का आचार,
मुझे आज भी याद है,

कॉलेज जाने के बाद,
तो साथ ही छूट गया,
बड़ी प्रोफेसर या लॉयर बन गयी होगी,
पढ़ने का बहुत शौक था उसे,
आज फेसबुक पर ढूंढती हूँ,
इस दीवाली नई फ़ोटो लेकर,
टैग करेंगे एक दूसरे को ।

पर्यावरण के पंखुड़ियां

पर्यावरण की पंखुड़ियां करती है पुकार,
इतनी बेदर्दी से न करो हम पर अत्याचार,

कल कल करते निश्छल पानी को
कारखानों के ज़हर ने मलिन कर दिया,
हरे वृक्षो के घने जंगलों को,
सूखे तनो का कब्रिस्तान कर दिया,
पवन के मदमस्त शीतल झोंको को,
काले धुंए का बादल बना दिया,
रात के टिमटिमाते आसमान को,
अंतरिक्ष से भी गहरी गुत्थी कर दिया,
लहलहाते हरे-पिले खेतो को,
विषाणुओ से ग्रस्त कर दिया,
वन के पराक्रमी जन्तुओ को,
किताबो की तस्वीरों तक सीमित कर दिया,

बस अब बहुत हुआ अत्याचार,
न् भर ले प्रकृति ऐसी हुंकार,
खोल ली अगर तीसरी आंख
तो दिखा देगी अपना रौद्र रूप,
सुनामी, भूकंप, बाढ़ एंव भूस्खलन से,
पड़ जाएगा अस्तित्व मनुष्य का खतरे में,
इस से पहले खत्म हो जाए संभालने का समय,
बनाना होगा हम सबको यह ध्येय,
करेंगे रक्षा प्रकृत्ति की खुद से बढ़कर,
रखेंगे भू के कण कण को सहज कर,
स्वच्छ करना होगा पृथ्वी, जल और वायु को,
और गिन गिन कर उपयोग करना होगा संपदा को,

क्योंकि पर्यावरण की पंखुड़ियां करती है पुकार,
इतनी बेदर्दी से न करो हम पर अत्याचार,

रोमांस की रोटी

यूं तो आटा और पानी दूर दूर रखा जाता है,
की कही आटा गिला न हो जाये
और कंगाली ले आये,
मतलब लड़का लड़की,
किसी गलत संगत में न् पड़ जाए,

पर जब पेट मे चूहें उधम मचाते है,
या प्यार का कीडा ‘lovebug’ काटता है,
फिर पानी आटे में धीरे धीरे मिलता,
लड़की को धीरे धीरे रिझाना पड़ता है,
इतनी आसानी से कहा मानती है भाइयो !
स्वाद के लिए नमक भी बुरका जाता है,
इन्हें माशूका के नखरे समझ लीजिये,
उसे गुथा जाता है,
जैसे प्यार की कशमकश, नोक झोंक है,
उसे बेलन से बेला जाता है,
मतलब अब प्यार परवान चढ़ने लगा है,
भले ही शादी के बाद बेलन का उपयोग बदल जाये,
पहले रोटियां गोल नही होती,
मोहब्बत में उतार चढ़ाव होते है,
इसलिए थोड़ा आटे का पलोथन भी लगाते है,
यानी कि तारीफ के पुल बंधकर, झूठे या सच्चे,
धीरे धीरे रोटी और प्यार को आकर देते है,
पलट पलट कर गरम तवे पर सेंका जाता है,
क्योंकि इश्क़ की तपिश दोनों तरफ बराबर है,
वो फूलती है,
यानी दोनों ही ख़ुशी में फुले नही समा रहे,

भले ही ये कविता कम,
और रोटी की विधि ज़्यादा लग रही है,
पर रोटी बनाने का एक एक कदम,
प्यार की recipe है,

सफर…

उस कत्रिम दूधिया रोशनी तले,
आंखों के तारे टिमटिमाते हुए,
मैं जाती हूँ रोज़ एक अनचाहे सफर पे,

घबराहट शुरू हो जाती है,
दरवाज़े के सामने भीड़ देख कर,
मां की बात याद आती है,
स्पर्श का भेद पहचानने पर,
सिहर उठता है बदन सोच-सोच कर,

मानव गुत्थी का जाल भेद,
प्रवेश करती हूँ चक्रव्यूह में,
तीखी चुभती नज़रो का वेग,
ला देता है सुनामी अंतर्मन में,

रंगी होती अगर पुरुष की हथेली,
जाहिर हो जाती बिभत्सता की होली,
मुझे भी नही मालूम इस व्यूह का तोड़,
खोल देता है जो आत्मविश्वास के जोड़

आश्रय देती ममता की छांव,
आंखों से रिस्ते है अंदरूनी घाव,
समझाती है तब एक महिला मुझे,
देता है हर ज़ख्म बल हमे,
ऐसे ही नही होती नारी श्रेष्ठ ।

दुल्हन

गहरी सोच में डूबा था मेरा मन,
कानो में पड़ी पायल की खन खन,

उत्सुक होकर मैंने आवाज़ का पीछा किया,
और उस नज़ारे को देख मैं दंग रह गया,

एक प्यारी सी दुल्हन आ रही थी,
उसकी मुस्कान गज़ब ढा रही थी,

लहंगे ने रंगों का ऐसा उत्सव मनाया,
जरी की चांदनी ने सबका मन भाया,

स्वर्ग की अप्सरा सा था उसका रूप,
मन को मेरे किया उसने अविभूत,

माहौल खुशियों से इस तरह भर गया,
वो पल हमेशा के लिए चित्त में घर कर गया ।।

मंजिल…

मंजिल अगर ख़ूबसूरत हो तो !!

पर्वत चढ़ने की पगडंडी बनती है,
खाई पार करने के लिए सेतु बनाती है,
उफनती दरिया में तैरने का साहस देती है,
आसमान में उड़ने के लिए पंख लगाती है,

रास्ते के काँटों को फूल में तब्दील करती है,
रिस्ते घावों को गर्व की लाली बनाती है,
गिरे हुए मनोबल को सहारा देती है,
उजाड़ दिख रहे भविष्य को ऊर्वरक देती है,

कड़वे वचनो को फूल की बौछार बनाती है,
उपहास की चोट पर मरहम लगाती है,
नीचा दिखाती हुई नज़रों में ऊपर उठाती है,
निराशा के अँधेरे की मशाल बनती है,

मुसीबतों का मुस्कुरा कर स्वागत करती है,
मुश्किल परिस्थितयों से जूझने का अदम्य साहस् देती है,
आईना बनाकर खुद से रूबरू कराती है,
बासी परतों को छिल कर व्यक्तित्व को निखारती है,

मंज़िल अगर ख़ूबसूरत हो तो क्या क्या करती है ||

जब गलती पकड़ी गई

सुबह से शाम हो गई,
बेचैनी की इंतहा हो गई,

आखिर वो पल आया,
मैंने खुद को कटघरे में पाया,

नज़रों के नौकिले बाण चले,
आत्मसम्मान को छन्नी कर गए,

एक मठरी खाने का ऐसा संताप हुआ,
कांच के घाव से ज़्यादा दर्द हुआ,

आचार की बरनी की टूटने की आवाज़,
कर गई थी मुसीबतों का आगाज़,

बिल्ली पर इल्ज़ाम लगा भी देता,
पर मेरे रिस्ते रक्त का क्या जवाब देता,

अब जब गलती पकड़ी ही गई,
प्रण लेता हो गुनाह न बनेगी,

क्योंकि दूसरी गलती गुनाहगार बनती है,
पर तभी जब वो पकड़ी जाती है !

अंधेरे की रोशनी

रात के अँधेरे में,
रोशनी एक जाग उठती,
मन के भीतर की,
भावनाएँ उज्जवल होती,
करती वो मुझ से बातें,
दिल को जो सुकून देती,
रात के अँधेरे में,
रोशनी एक जाग उठती,

दिन भर के अवलोकन का,
कलरव वो मुझसे करती,
मस्तिष्क के तारो का,
तनाव वो दूर करती,
नई ऊर्जा का,
शरीर में संचार वो करती,
रात के अँधेरे में,
रोशनी एक जाग उठती,

भावनाएँ अपना आँचल फैला,
मुझे आगोश में समेट लेती,
अमन की लोरी सुना,
मुझे नींद में धकेल देती,
प्रकाश जो मन में जला,
उसे संजो के रखती,
रात के अँधेरे में,
रोशनी एक जाग उठती,

उठेंगे जब सुबह,
चेहरे पर मुस्कान होगी,
मन की रोशनी,
व्यक्तित्व की प्रभा होगी,
नये दिन के नयी चुनोतियाँ,
अब बहुत छोटी लगेगी,
वो अँधेरे की रोशनी,
दिन में मन की मशाल बनेगी,