दशक बीत गया गुलाल गालों को छुए,
पढ़ाई, नौकरी, उन्नति, की व्यस्तता में,
जीवन से रंग उड़ गए,
क्या दिन थे वो,
होलिका दहन से ही
मस्ती का आगाज़ हो जाता था,
एक तरफ टेसु के फूल पकते थे,
दूसरी ओर हलवाई की कढ़ाई से
पकोड़ो की खुशबु भीनभीनाती थी,
हमारी कॉलोनी में कौन रहता है,
उसी दिन ज्ञात होता था,
और अगले दिन
स्कूल के लिए नाटक करने वाले बच्चे,
फागुन के दिन सुबह उठ कर,
पिचकारी को बंदूक सरीखे तैयार करते थे,
ग्रेनेड की तरह पानी के गुब्बारों को भरते थे,
बाल्टी में घुला रंग तो बारूद होता था,
शालीन दिखने वाले पढ़ाकू चश्मीश भी,
हाथापाई होने पर,
गुलाल और पक्के रंगो से लहूलुहान हो जाते है,
आलम ये होता था की
माँ अपने बच्चों को नही पहचान पाती थी,
दोस्तों का जब हुजूम निकलता था,
हिमस्खलन के गोले के तरह,
आकार में बढ़ता ही जाता था,
न जान पहचान,
बस रंग का रिश्ता था,
गीले शिक़वे पानी में धुल जाते थे,
जिसके घर जाते, व्यंजनो से स्वागत पाते,
वो गुंजिया, ठंडाई, इमली के भल्ले,
अब तो बस मुँह में पानी लाकर छोड़ देते है,
रंगों के सुरूर में लिप्त,
शाम को मेले में बैंगानी और गुलाबी चेहरे,
होली के हुड़दंग का साक्ष्य देते थे,
थके हारे सब किस्से कहानियां सुनते,
नई रिश्ते, यादें बना,
फिर जीवन ने मगन हो जाते,
ऐसी थी होली की हमजोली !



