चली गई वो ऑफिस से एक दिन
पर उसकी खुमारी नहीं गई
कभी वो मेरी डेस्क पर आती
कभी मैं उसकी
खूब हँसी ठिठोली की बातें होती
कभी कभी काम की भी
अब वो डेस्क एक याद रह जाएगी
मन तो करता है की किसी और की न हो
खाली रहेगी तो
उसकी याद में कभी कभी बैठ जाया करूँगा
मेरी उँगलिया उसका फ़ोन एक्सटेंशन ही टटोलती है
अब इन उँगलियों को भी याददाश्त भूलनी होगी
कैंटीन में चाय की चुस्की में वो बात न रहेगी
क्यूंकि चाय तो बहाना था
रस तो उसकी बातों का था
अब अपना लंच करना पड़ेगा
नहीं तो उसके राजमा चावल से ही पेट भरता था
उसके होते हुए बॉस की डाँट से भी फ़रक नहीं पड़ता था
क्यूंकि वो मेरा ऑइंटमेंट जो थी
बड़े बड़े टारगेट चुटकी भर का खेल लगते थे
अब कौन सुनेगा वो कड़वी बातें
कैसे पूरे होगे ये क्लाइंट के टारगेट
उसके बिना काम में भी मन नहीं लगता
ऑफिस तो अनजान लगता है
सोच रहा हूँ मैं भी छोड़ दु
और उसी के कंपनी में जॉब कर लूँ
बस परदेस ही तो जाना होगा !


